बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अगर नगर पालिका ने दे दिया है कंप्लीशन सर्टिफिकेट तो रेरा नहीं करेगा दखल

बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अगर नगर पालिका ने दे दिया है कंप्लीशन सर्टिफिकेट तो रेरा नहीं करेगा दखल

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रियल एस्टेट के मामलों में रेरा के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि किसी कॉलोनी या प्रोजेक्ट को नगर निगम या नगर पंचायत से पूर्णता प्रमाण पत्र (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) मिल चुका है तो रेरा को उसकी जांच करने का कोई हक नहीं है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एनके प्रसाद की बेंच ने बिलासपुर की जीवन विहार कॉलोनी के मामले में सुनवाई करते हुए रेरा ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि जब तक सक्षम अधिकारी उस सर्टिफिकेट को खुद रद्द न करे तब तक रेरा उसमें टांग नहीं अड़ा सकता।

क्या है पूरा विवाद और क्यों पहुंचा कोर्ट

बिलासपुर के बोदरी स्थित जीवन विहार कॉलोनी के रहने वालों और बिल्डर के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही थी। कॉलोनी की रेजिडेंट्स वेलफेयर सोसायटी ने रेरा में शिकायत की थी कि बिल्डर ने सड़क नाली स्ट्रीट लाइट और गार्डन जैसी बुनियादी सुविधाएं अधूरी छोड़ी हैं। बिल्डर ने दलील दी कि उसे 22 मार्च 2017 को ही नगर पंचायत से पूर्णता प्रमाण पत्र मिल गया था जबकि रेरा का कानून मई 2017 से लागू हुआ। बिल्डर का कहना था कि प्रोजेक्ट पुराना होने के कारण रेरा के दायरे में नहीं आता। रेरा ने बिल्डर की बात नहीं मानी और कलेक्टर को जांच के आदेश दे दिए जिसके खिलाफ बिल्डर हाई कोर्ट चला गया।

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हाई कोर्ट ने कानून की बारीकियां समझाईं

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दो मुख्य बातों पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करना नगर पालिका अधिनियम का हिस्सा है। इसकी जांच केवल वही विभाग कर सकता है जिसने इसे जारी किया है। रेरा अथॉरिटी को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे सरकारी विभाग के सर्टिफिकेट की वैधता पर सवाल उठाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि साल 2018 में जारी किया गया संशोधित सर्टिफिकेट कोई नया कागज नहीं है बल्कि वह 2017 के मूल सर्टिफिकेट का ही हिस्सा माना जाएगा।

सोसायटी की शिकायत अब कहां जाएगी

अदालत के इस फैसले से कॉलोनी के लोगों को बड़ा झटका लगा है जो सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। हालांकि कोर्ट ने एक रास्ता खुला रखा है। आदेश में कहा गया है कि यदि नगर पालिका का अधिकारी जांच में उस सर्टिफिकेट को नियमों के खिलाफ पाता है और उसे निरस्त कर देता है तभी पीड़ित पक्ष दोबारा रेरा की शरण में जा सकते हैं। इस फैसले के बाद अब बिल्डरों को बड़ी राहत मिली है क्योंकि पुराने प्रोजेक्ट्स पर रेरा की सख्ती अब कम हो जाएगी।

 

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