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हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: 5 साल तक क्या सोती रही पुलिस? पाम मॉल जमीन विवाद में एसपी ने मांगी बिना शर्त माफी
बिलासपुर/कोरबा। न्याय के सिद्धांत में कहा जाता है कि न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान है। इसी सूत्र को आधार बनाकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा के चर्चित पाम मॉल भूमि विवाद मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2020 से लंबित जांच और पुलिस की सुस्ती पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने इतनी सख्त नाराजगी जताई कि कोरबा पुलिस अधीक्षक (SP) को खुद हलफनामा दायर कर माफी मांगनी पड़ी।
रिकॉर्ड में हेरफेर:1954 के दस्तावेजों से खुलेगी पोल
यह मामला केवल जमीन के टुकड़े का नहीं, बल्कि सरकारी रसूख और राजस्व रिकॉर्ड में की गई कथित सर्जिकल स्ट्राइक का है। आरोप है कि कोरबा के प्राइम लोकेशन पर स्थित पाम मॉल के निर्माण के लिए खसरा नंबर 663/3 रकबा 0.0380 की सीमाओं में बदलाव किया गया। याचिकाकर्ता अंकित सिंह के अनुसार, 1954-55 और 1991 के मूल मिसल बंदोबस्त रिकॉर्ड को दरकिनार कर निजी हितों के लिए दस्तावेजों की कूटरचना की गई। वर्ष 2020 में 420. 465 467, 468, 471 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज होने के बावजूद पुलिस अब तक किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी थी, जिसे कोर्ट ने जांच में जानबूझकर की गई देरी की श्रेणी में रखा।
निचली अदालत ने पकड़ी थी पुलिस की गलती, फिर भी नहीं चेते अफसर
प्रकरण में नया मोड़ तब आया जब कोरबा की ट्रायल कोर्ट ने पुलिस द्वारा पेश की गई खात्मा रिपोर्ट' (Closer Report) को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। 10 नवंबर 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पाया कि विवेचना अधिकारी ने उन बुनियादी सात बिंदुओं को छुआ तक नहीं, जो जालसाजी को साबित करने के लिए अनिवार्य थे। कोर्ट ने 60 दिनों के भीतर पूरक जांच (Further Investigation) कर रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीतने के बाद भी जब पुलिस ने चुप्पी साधे रखी, तब मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा
कटघरे में खाकी: सांठगांठ के आरोपों के बीच एसपी का शपथपत्र
हाईकोर्ट की फटकार के बाद कोरबा एसपी ने अपने व्यक्तिगत शपथपत्र में स्वीकार किया कि जांच में विलंब हुआ है। उन्होंने इसका ठीकरा राजस्व रिकॉर्ड की अनुपलब्धता' पर फोड़ा। हालांकि, कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए विभाग ने अब विवेचना अधिकारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई और कारण बताओ नोटिस जारी करने की बात कही है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने खुले तौर पर पुलिस और भू-माफियाओं के बीच गहरे गठजोड़ का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि रसूखदारों को बचाने के लिए ही 5 सालों में एक भी गिरफ्तारी नहीं की गई।
दो सप्ताह का अल्टीमेटम: अब मजिस्ट्रेट लेंगे निर्णय...
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता और याचिकाकर्ता के पारिवारिक संकट (पिता का पक्षाघात और आर्थिक तंगी) को देखते हुए अब निचली अदालत को कड़े निर्देश दिए हैं। पुलिस ने आनन-फानन में 07 फरवरी 2026 को अपनी पूरक रिपोर्ट पेश कर दी है। अब हाईकोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देशित किया है कि वे अगले 14 दिनों के भीतर इस रिपोर्ट पर अपना अंतिम आदेश पारित करें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि पीड़ित पक्ष इस नई जांच से संतुष्ट नहीं होता, तो उसके पास वैधानिक विरोध (Protest Petition) दर्ज कराने का अधिकार सुरक्षित है। इस आदेश के बाद अब जिला प्रशासन और पुलिस महकमे में हड़कंप है, क्योंकि मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी आंच अब सीधे तौर पर जांच अधिकारियों पर आ रही है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
