बाहरी साहब की अंतिम पारी और बड़े बंगले का मायाजाल

बाहरी साहब की अंतिम पारी और बड़े बंगले का मायाजाल

रायपुर। सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक बाहरी साहब के चर्चे आम हैं। चर्चा काम की कम और उनके अंतिम मोह की ज्यादा है। सियासी हलकों में दबी जुबान में कहा जा रहा है कि दूसरे प्रदेश से आए इन बड़े बंगले वाले नेता जी ने भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए हैं। आलम यह है कि साहब ने अब मंत्री और अफसरों के हिस्से पर भी डाका डालना शुरू कर दिया है। राजनीति के जानकार इसे साहब की अंतिम कमाई का नाम दे रहे हैं।

फिक्स है 'रेट कार्ड', टेंडर में भी दखल

सुना है कि साहब के रसूख वाले प्रशासनिक पद का अब एक मंथली रेट तय हो गया है। विभाग कोई भी हो, अगर फाइल आगे बढ़ानी है या कुर्सी बचानी है, तो साहब की मशीनरी को तेल देना अनिवार्य है। चर्चा तो यहां तक है कि छोटे-बड़े सभी टेंडरों में अब साहब का सीधा दखल रहता है। इस पूरी 'सेटिंग' को अंजाम देने के लिए बड़े बंगले में एक खास आदमी को तैनात किया गया है, जो साहब के 'कलेक्शन एजेंट' के रूप में मशहूर हो चुका है।

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जब मंत्री हुए बेबस, बंगले से मिला अभयदान

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इस रसूख का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू मंत्रियों की बेबसी है। कहा जा रहा है कि अगर कोई मंत्री किसी भ्रष्ट या अकर्मण्य अधिकारी को पद से हटाने की फाइल चलाता है, तो वह अधिकारी सीधा बड़े बंगले की शरण में पहुंच जाता है। वहां कुछ ले-देकर मामला ऐसा सेट होता है कि साहब चंद रुपयों के बदले उस अधिकारी को अभयदान दे देते हैं। मंत्री जी हाथ मलते रह जाते हैं और साहब की तिजोरी और भारी हो जाती है।

दिल्ली दरबार में रिश्तेदारी का जलवा

साहब का जलवा सिर्फ प्रदेश तक सीमित नहीं है। दिल्ली के छत्तीसगढ़ भवन में भी इनके रसूख की धमक सुनाई देती है। चर्चा है कि साहब के एक रसूखदार रिश्तेदार ने वहां एक कमरा स्थायी तौर पर हथिया लिया है। इतना ही नहीं, प्रदेश के कोटे की एक सरकारी गाड़ी भी वहां सिर्फ उन रिश्तेदार महोदय की सेवा में 24 घंटे तैनात रहती है। प्रोटोकॉल और नियमों की धज्जियां उड़ती देख वहां का स्टाफ भी हैरान है, लेकिन साहब के खौफ के आगे सब मौन हैं।

चर्चा जोरों पर है...

सियासी गलियारों में लोग अब चुटकी ले रहे हैं कि साहब अपनी इस पारी को विदाई मैच मानकर खेल रहे हैं, जहां उन्हें सिर्फ रन बनाने से मतलब है, चाहे टीम (सरकार) की छवि ही क्यों न दांव पर लग जाए। अब देखना यह है कि 'बड़े बंगले' का यह खेल कब तक चलता है या फिर दिल्ली का आलाकमान इस अंतिम कमाई पर ब्रेक लगाता है।

  • चर्चा तो होगी ही!
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