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क्या गेम खेलने से बच्चों की मेंटल हेल्थ खराब होती है? तीन नाबालिग लड़कियों की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल
गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है. शुरुआती जांच में पता चला है ये बहनें कई सालों से घर पर रहती थीं और इनको ऑनलाइन गेमिंग और मोबाइल की लत थी. हालांकि अभी पुलिस कई एंगल पर जांच कर रही है, लेकिन ऑनलाइन गेमिंग की लत को आत्महत्या का एक बड़ा कारण माना जा रहा है. ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या जरूरत से ज्यादा गेम खेलना बच्चों की मेंटल हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकता है?
डॉ. बताते हैं कि ऑनलाइन गेम्स में हार-जीत का खेल हैं तो ये बच्चों की मेंटल हेल्थ को खराब करता है. क्योंकि इसमें हार क दबाव बच्चों के आत्मसम्मान को प्रभावित करता है अगर कोई गेम हिंसक है तो वह आक्रामकता और अकेलापन बढ़ा सकते हैं. डॉ कहते हैं कि 18 साल से कम उम्र में कुछ बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं और सोशल वैलिडेशन या गेम में हुई हार जीत पर निर्भर हो जाते हैं. अगर उन्हें गेम खेलने से खुशी मिलती है और कोई उस खुशी के कारण उनको गेम की लत लग जाती है. जिसको छोड़ना मुश्किल हो जाता है.
आॉलाइन गेम मौत का कारण कैसे बनते हैं?
डॉ. बताते हैं किआज के टास्क-बेस्ड ऑनलाइन गेम्स में इस्तेमाल होने वाली गेमिफिकेशन तकनीकें, जैसे रिवॉर्ड्स, लेवल्स और स्ट्रीक्स, बच्चों के दिमाग पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर डालती हैं. ये गेम्स दिमाग में डोपामिन रिलीज़ कर बच्चों को आभासी दुनिया में सफलता और नियंत्रण का एहसास कराते हैं, जिससे धीरे-धीरे वास्तविक जीवन की प्राथमिकताएं पीछे छूटने लगती हैं और खेल व हकीकत के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है.
डॉ कहते हैं कि जब बच्चा इन-गेम टास्क पूरे करने पर भावनात्मक रूप से निर्भर होने लगता है, तो यह उसकी मानसिक सेहत, पढ़ाई और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित कर सकता है. उनको इसकी लत लग जाती है और अगर उनको इससे किसी कारण दूर जाना पड़े तो इससे उनकी मेंटल हेल्थ बिगड़ जाती है. इसकी शुरुआत डिप्रेशन से होती है जो आत्महत्या तक जा सकती है.
माता- पिता को क्या करना चाहिए
ऐसे में माता-पिता की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. उन्हें बच्चों से खुलकर और बिना जज किए संवाद करना चाहिए, स्क्रीन टाइम की स्वस्थ सीमाएं तय करनी चाहिए और शारीरिक गतिविधियों, हॉबीज़ व पारिवारिक समय को बढ़ावा देना चाहिए. अगर बच्चा परिवार से कटने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए, नींद और पढ़ाई में गिरावट आए या पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि खो दे, तो ये चेतावनी संकेत हैं.
ऐसी स्थिति में केवल स्क्रीन टाइम कम करना काफी नहीं होता, बल्कि समय रहते मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद लेकर बच्चे के लिए संतुलित दिनचर्या, भावनात्मक जुड़ाव और वास्तविक दुनिया का मजबूत सपोर्ट सिस्टम दोबारा तैयार करना जरूरी है.
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
