‘महिला की मर्जी सर्वोपरि’: 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने की सुप्रीम कोर्ट ने दी अनुमति, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

‘महिला की मर्जी सर्वोपरि’: 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने की सुप्रीम कोर्ट ने दी अनुमति, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिला की प्रजनन स्वतंत्रता को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर कोई महिला गर्भावस्था पूरी नहीं करना चाहती, तो उसे इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही गर्भ 30 हफ्ते का ही क्यों न हो।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला को बच्चे को जन्म देने का निर्देश दिया गया था और बाद में गोद देने का विकल्प सुझाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे महिला के मौलिक अधिकारों के खिलाफ माना।

30 हफ्ते की प्रेगनेंसी खत्म करने की इजाजत
सुप्रीम कोर्ट ने आज 6 फरवरी को अपने फैसले में युवती को 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दे दी। अदालत ने दो टूक कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। याचिकाकर्ता युवती 17 वर्ष की उम्र में गर्भवती हुई थी और अब उसकी उम्र 18 साल 4 महीने है। वर्तमान में उसकी गर्भावस्था 30 हफ्ते की हो चुकी थी।

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हाई कोर्ट का फैसला क्यों पलटा गया?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले कहा था कि गर्भ को पूरा किया जाए और बाद में बच्चे को गोद देने का विकल्प अपनाया जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवेदनहीन और अव्यावहारिक मानते हुए कहा कि महिला को मानसिक और शारीरिक पीड़ा सहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, सिर्फ इसलिए कि गर्भ अधिक अवधि का हो चुका है।

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मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट बनी आधार
शीर्ष अदालत ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का गहन अध्ययन किया और पाया कि गर्भपात से महिला के जीवन को कोई गंभीर खतरा नहीं है। इसी आधार पर गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने माना कि गर्भावस्था जारी रखना युवती के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत कष्टदायक होगा।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुद्दा यह नहीं है कि संबंध सहमति से बना था या नहीं। अहम यह है कि महिला मां नहीं बनना चाहती। महिला की प्रजनन स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने आगे कहा कि “अजन्मे बच्चे के अधिकारों से ऊपर महिला का अपने शरीर और जीवन पर अधिकार है।

कानूनी और सामाजिक दृष्टि से ऐतिहासिक फैसला
यह फैसला न केवल महिला अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य किसी महिला को दंडित करना नहीं, बल्कि उसकी गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना है। यह निर्णय आने वाले समय में गर्भपात से जुड़े मामलों में न्यायिक दिशा तय करने वाला मील का पत्थर माना जा रहा है।

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