चिकित्सा शिक्षा विभाग में 100 करोड़ का टेंडर सेट: चहेती कंपनी को रेवड़ी बांटने का खेल, नियम बदलकर स्थानीय एजेंसियों को किया बाहर

चिकित्सा शिक्षा विभाग में 100 करोड़ का टेंडर सेट: चहेती कंपनी को रेवड़ी बांटने का खेल, नियम बदलकर स्थानीय एजेंसियों को किया बाहर

रायपुर। छत्तीसगढ़ के चिकित्सा शिक्षा विभाग में मैनपावर सप्लाई के नाम पर एक बड़े खेल की बिसात बिछाई गई है। करीब 100 करोड़ रुपए के इस मेगा टेंडर में चहेती बाहरी कंपनी को उपकृत करने के लिए नियमों को इस कदर मरोड़ा गया कि स्थानीय और छोटे वेंडर रेस से पहले ही बाहर हो गए। इस कथित टेंडर सेटिंग का सबसे सनसनीखेज पहलू सुरक्षा राशि यानी ईएमडी का निर्धारण है। नियमानुसार 100 करोड़ के काम के लिए एक प्रतिशत यानी 1 करोड़ रुपए की ईएमडी होनी चाहिए थी, लेकिन अफसरों की विशेष मेहरबानी से इसे घटाकर महज 6 लाख रुपए कर दिया गया।

ईएमडी में दी गई यह अभूतपूर्व छूट ही इस बात की गवाही दे रही है कि पर्दे के पीछे किसी खास सिंडिकेट को फायदा पहुंचाने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। अब यह पूरा मामला कोर्ट की चौखट तक पहुंच चुका है और विभाग की इस संदिग्ध कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

लोकल एजेंसियों का गला घोंटने क्लबिंग का फॉर्मूला

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प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह खत्म करने के लिए विभाग ने एक नया पैंतरा आजमाया है। पहले सुरक्षा गार्ड, सफाई कर्मी, कंप्यूटर ऑपरेटर, ड्राइवर और तकनीकी स्टाफ जैसी अलग-अलग सेवाओं के लिए पृथक निविदाएं जारी होती थीं। लेकिन इस बार सभी विधाओं को मिलाकर एक ही विशाल टेंडर बना दिया गया। इसके साथ ही पात्रता की शर्तें इतनी कठिन कर दी गईं कि छत्तीसगढ़ की कोई भी स्थानीय एजेंसी इसमें टिक न सके। टेंडर में 100 करोड़ रुपए का टर्नओवर, 10 करोड़ का सिंगल वर्क ऑर्डर और न्यूनतम 300 मैनपावर संचालन का अनुभव अनिवार्य कर दिया गया। स्थानीय व्यवसाइयों का साफ कहना है कि प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग के इतिहास में आज तक ऐसा कोई सिंगल वर्क ऑर्डर रहा ही नहीं, जहां 300 कर्मचारी एक साथ तैनात रहे हों। यानी यह शर्त केवल एक ही विशेष बाहरी कंपनी को ध्यान में रखकर ड्राफ्ट की गई है।

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जेम पोर्टल को ठेंगे पर रखा, पारदर्शिता का जनाजा निकाला

केंद्र सरकार ने साल 2017 से ही सभी सरकारी खरीद और सेवाओं के लिए जेम पोर्टल को अनिवार्य कर रखा है। इसके बावजूद इस 100 करोड़ की बड़ी निविदा को जेम पोर्टल से दूर रखा गया। इतना ही नहीं, टेंडर का व्यापक प्रचार प्रसार भी नहीं किया गया ताकि चुनिंदा कंपनियों के अलावा किसी और को इसकी भनक न लग सके। जब पारदर्शिता का पूरी तरह जनाजा निकल गया, तब जाकर स्थानीय ठेकेदारों और संगठनों को इस गड़बड़झाले की भनक लगी।

अफसरों की सफाई: जेम ने रिजेक्ट कर दिया था

इस पूरे घमासान और शिकायतों पर चिकित्सा शिक्षा विभाग के संचालक डॉ. यूएस पैकरा का कहना है कि टेंडर को लेकर शिकायतें मिली हैं और कुछ लोग कोर्ट भी गए हैं। उन्होंने दलील दी कि जेम पोर्टल के जरिए प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन वहां से इसे रिजेक्ट कर दिया गया, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जा रही है। बहरहाल, अफसरों की इस सफाई से स्थानीय व्यवसायियों का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है और अब पूरी निविदा प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है।

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