महाघोटाला: खदानों की धूल फांकते रहे गरीब, इधर DMF के 500 करोड़ डकार गया अफसर-ठेकेदार सिंडिकेट

महाघोटाला: खदानों की धूल फांकते रहे गरीब, इधर DMF के 500 करोड़ डकार गया अफसर-ठेकेदार सिंडिकेट

रायपुर। डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) का पैसा उन आदिवासियों और गरीबों की जिंदगी बदलने के लिए था, जिनके फेफड़ों में खदानों की धूल और बारूद का धुआं भर रहा था। लेकिन छत्तीसगढ़ के रसूखदार सफेदपोशों ने इस खून-पसीने की कमाई को अपना पर्सनल एटीएम बना लिया। स्कूलों में स्मार्ट क्लास, आरओ वाटर प्यूरीफायर और चौराहों पर सोलर लाइट लगाने का महज ढोंग रचा गया। इस पूरी कवायद का असली मकसद था- ठेकेदारों से 40 फीसदी का फिक्स और मोटा कमीशन ऐंठना।

ईओडब्ल्यू (EOW) की ओर से कोर्ट में पेश 5000 पन्नों की चार्जशीट ने इस बात का सनसनीखेज पर्दाफाश किया है कि कैसे 9 हजार करोड़ से ज्यादा के इस फंड में 500 करोड़ से ज्यादा की बेखौफ और नंगी लूट मचाई गई।

सिस्टम ही कर लिया हाइजैक, कैबिनेट तक से करा ली मनमर्जी

लूट की यह स्क्रिप्ट कोई छोटी-मोटी नहीं थी। ईओडब्ल्यू की जांच चीख-चीख कर कह रही है कि अपने चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए ऊपर से नीचे तक पूरा सिस्टम ही 'हाइजैक' कर लिया गया था। चार्जशीट के मुताबिक, रिटायर्ड आईएएस अनिल टुटेजा ने अपने रसूख का ऐसा खौफनाक इस्तेमाल किया कि सीधे नीतिगत स्तर पर ही डीएमएफ के नियमों में संशोधन करवा दिया। लोक कल्याण के इस फंड को बड़ी ही चालाकी से 'सप्लाई बेस' टेंडरों में बदल दिया गया। यानी विकास के वो काम चुने गए जिनमें कागजों पर फर्जी बिल लगाकर सबसे ज्यादा कमीशन का खेल हो सके।

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40% की डकैती, कैश हैंडलर ने बांटे करोड़ों

यह कोई सामान्य भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि दिनदहाड़े 40 प्रतिशत तक कमीशन वसूलने की संस्थागत डकैती थी। चुनिंदा कंपनियों और वेंडरों को कलेक्टरों पर दबाव बनाकर ऊंचे दामों पर ठेके दिलाए गए। कारोबारी सतपाल सिंह छाबड़ा ने इस पूरे खूंखार सिंडिकेट में मुख्य कैश हैंडलर की भूमिका निभाई। जांच में सामने आया है कि छाबड़ा के नेटवर्क से 60.75 करोड़ रुपए का कमीशन बटोरा गया, जिसमें से 14.62 करोड़ रुपए सीधे अनिल टुटेजा तक पहुंचाए गए। ईओडब्ल्यू के हाथ लगे वाट्सएप चैट, बैंक स्टेटमेंट और डिजिटल साक्ष्य इस पूरी काली कमाई की पुख्ता गवाही दे रहे हैं।

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कोरबा बना लूट का एपीसेंटर, रसूखदारों की पूरी फौज शामिल

इस महाघोटाले का सबसे बड़ा एपीसेंटर कोयलांचल कोरबा रहा, जहां से फंड की सबसे ज्यादा बंदरबांट हुई। तत्कालीन कलेक्टर और निलंबित आईएएस रानू साहू ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई। ईओडब्ल्यू की रडार पर सिर्फ टुटेजा या साहू नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन सीएम की उप सचिव सौम्या चौरसिया, माइनिंग सेक्रेटरी समीर विश्नोई और सिंडिकेट का अहम मोहरा कारोबारी सूर्यकांत तिवारी भी शामिल हैं। इसके अलावा संजय शेंडे, अशोक अग्रवाल, मुकेश अग्रवाल समेत एक दर्जन से अधिक कारोबारियों के गिरेबान तक जांच की आंच पहुंच चुकी है।

गरीबों के हक पर डाका:

2019 से 2024 के बीच डीएमएफ में 9188.20 करोड़ रुपए आए थे। यह पैसा स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए था, लेकिन इस संगठित तंत्र ने इसे अपनी तिजोरियां भरने का जरिया बना लिया। नोटशीट से लेकर फील्ड तक, हर स्तर पर बिचौलियों और अफसरों का गठजोड़ हावी था। अब 5000 पन्नों के इस ठोस सबूतों वाले पुलिंदे के बाद देखना यह है कि इन रसूखदारों पर कानून का हथौड़ा और कितनी बेरहमी से बजता है।

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