छग में रोजाना 150 करोड़ का कोयला घोटाला पिछली सरकार के 25 रुपये टन से भी बड़ा सिंडिकेट 5 मास्टरमाइंड कर रहे पूरा खेल

छग में रोजाना 150 करोड़ का कोयला घोटाला पिछली सरकार के 25 रुपये टन से भी बड़ा सिंडिकेट 5 मास्टरमाइंड कर रहे पूरा खेल

रायपुर। छत्तीसगढ़ में कोयले का काला खेल अब सिर्फ चौराहों की चर्चा नहीं रह गया है बल्कि यह एक बेहद बड़े और संगठित सिंडिकेट के रूप में सामने आ चुका है। प्रदेश की खदानों से लेकर रेलवे साइडिंग ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और सीधे प्लांट तक फैले इस पूरे तंत्र में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। जानकारों के मुताबिक इस पूरे सिंडिकेट के कारण राज्य और केंद्र सरकार को हर दिन करीब 150 करोड़ रुपए का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा साफ बताता है कि कोयला चोरी का यह तंत्र कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुका है।

खदानों से शुरू होकर साइडिंग तक ऐसे पहुंचता है खेल

राज्य की प्रमुख कोयला खदानों मानिकपुर गेवरा कुसमुंडा राजमार्ग ढेलवाडीह और सिंघाली सहित कई अन्य जगहों पर बिल्कुल एक ही तरीके से काम किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार खदान से कोयला निकालने के बाद उसे मालगाड़ियों में लोड किया जाता है और असली गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से हो जाती है। सूत्र बताते हैं कि खदानों में ही सेटिंग करके मालगाड़ी के डिब्बों में तय क्षमता से कहीं अधिक कोयला भर दिया जाता है। इस वजह से कागजों में दर्ज वजन और मालगाड़ी में भरे गए असली कोयले के वजन में जमीन आसमान का अंतर पैदा हो जाता है। इसके बाद जब यह मालगाड़ी साइडिंग विशेषकर कोरबा के मानिकपुर साइडिंग पर पहुंचती है तब रेक रिवीलिंग के नाम पर असली खेल खेला जाता है।

मानिकपुर साइडिंग बना इस पूरे भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा हब

मानिकपुर साइडिंग को इस पूरे अवैध नेटवर्क का सबसे प्रमुख हब या केंद्र बताया जा रहा है। यहां मालगाड़ी के डिब्बों से वह अतिरिक्त कोयला निकाल लिया जाता है जिसे मिलीभगत करके खदान से ज्यादा भरवाकर लाया गया था। इसके बाद निकाले गए उस कोयले को तुरंत ट्रकों और हाइवा में लोड कर दिया जाता है। सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को कागजों पर पूरी तरह से वैध दिखाया जाता है। धर्मकांटे यानी वजन मापने वाली मशीन के माध्यम से पर्ची कटवाकर इस कोयले को कानूनी तरीके से सीधे पावर प्लांट और फैक्ट्रियों तक पहुंचाया जाता है। ऐसा करने से यह चोरी का कोयला न रहकर एक वैध ट्रांसपोर्ट का हिस्सा बन जाता है। सिस्टम की इसी खामी का फायदा उठाकर यह सिंडिकेट रोजाना करोड़ों का वारे न्यारे कर रहा है और इसे पकड़ पाना जांच एजेंसियों के लिए भी मुश्किल हो रहा है।

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सिंडिकेट के पांच नाम आखिर मास्टरमाइंड कौन

सूत्रों के हवाले से इस पूरे सिंडिकेट के पीछे पांच प्रमुख लोगों के नाम सबसे ज्यादा गूंज रहे हैं। इनमें सिंह महतो तिवारी जायसवाल और मिश्रा शामिल हैं। इन पांचों को प्रदेश के कोयला कारोबार का नया मास्टरमाइंड बताया जा रहा है। हालांकि इन गंभीर आरोपों की अभी तक किसी जांच एजेंसी ने स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है। बताया जा रहा है कि इन पांचों के नेटवर्क में खदान से जुड़े बड़े अधिकारी रेलवे के कर्मचारी ट्रांसपोर्टर ब्यूरोक्रेसी के अहम हिस्से और रसूखदार नेताओं की पूरी फौज शामिल है। इसी तगड़े राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की वजह से यह पूरा खेल सालों से बिना किसी डर और व्यवधान के बेखौफ चलता आ रहा है।

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पिछली सरकार के घोटाले से भी बड़े खेल की आशंका

छत्तीसगढ़ के लिए कोयला परिवहन में गड़बड़ी का यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी प्रति टन 25 रुपए की अवैध वसूली का एक बहुत बड़ा मामला सामने आया था। उस समय इस घोटाले में कई बड़े अधिकारियों ताकतवर आईएएस अफसरों और कद्दावर नेताओं के नाम सामने आए थे। केंद्रीय एजेंसियों की जांच के बाद कई बड़ी गिरफ्तारियां भी हुई थीं और कई लोग आज भी जेल में हैं। उस बड़ी कार्रवाई के बाद प्रदेश की जनता को उम्मीद थी कि अब कोयले के काले कारोबार पर पूरी तरह से लगाम लग जाएगी। लेकिन वर्तमान हालात और 150 करोड़ रोजाना नुकसान के दावों को देखकर अब ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या सिस्टम में कोई सुधार हुआ या फिर भ्रष्टाचार का खेल और ज्यादा संगठित तथा चालाक हो गया है।

ईमानदार व्यापारियों का नुकसान और जांच की मांग

सूत्रों के मुताबिक रेलवे साइडिंग से निकाला गया यह अतिरिक्त कोयला सीधे उद्योगों और प्लांटों तक पहुंचता है। यह कोयला ट्रांसपोर्टरों के जरिए भेजा जाता है और कागजों में सब कुछ नियमों के तहत दिखाया जाता है। इससे न केवल सरकार को करोड़ों के राजस्व का भारी नुकसान होता है बल्कि ईमानदारी से टैक्स देकर व्यापार करने वाली कंपनियों के लिए भी एक असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन जाती है। विपक्ष अब सरकार पर हमलावर है और लगातार यह आरोप लगा रहा है कि बिना सत्ता के संरक्षण के इतना बड़ा नेटवर्क एक दिन भी नहीं चल सकता। सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने अब इस पूरे सिंडिकेट की उच्च स्तरीय जांच एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। 

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