वैष्णो देवी रोपवे विवाद फिर गरमाया: आस्था और रोज़गार पर खतरे का आरोप, घोड़ा-पिट्ठू यूनियनों ने 20 लाख मुआवजे की रखी मांग

वैष्णो देवी रोपवे विवाद फिर गरमाया: आस्था और रोज़गार पर खतरे का आरोप, घोड़ा-पिट्ठू यूनियनों ने 20 लाख मुआवजे की रखी मांग

कटड़ा। माता वैष्णो देवी में प्रस्तावित रोपवे परियोजना को लेकर एक बार फिर विरोध तेज हो गया है। कटड़ा में स्थानीय संगठनों, घोड़ा-पिट्ठू-पालकी यूनियनों और व्यापारिक प्रतिनिधियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।

बुधवार को पिट्ठू, घोड़ा और पालकी यूनियन के अध्यक्षों, माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति के सदस्यों और विभिन्न सामाजिक-व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने रोपवे परियोजना पर गठित उच्चस्तरीय समिति से मुलाकात कर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रतिनिधियों ने कहा कि यह परियोजना केवल एक विकास कार्य नहीं, बल्कि सीधे तौर पर धार्मिक परंपराओं और स्थानीय आजीविका से जुड़ा मुद्दा है।

‘आस्था की यात्रा, कारोबारी प्रोजेक्ट नहीं’
संगठनों का कहना है कि माता वैष्णो देवी की यात्रा सदियों से पैदल मार्ग, पिट्ठू, घोड़ा और पालकी सेवा के माध्यम से होती आ रही है। यही इस तीर्थ की पहचान और श्रद्धालुओं की आस्था का मूल स्वरूप है। रोपवे शुरू होने से न सिर्फ यात्रा की पारंपरिक भावना कमजोर होगी, बल्कि श्रद्धालुओं और स्थानीय सेवा प्रदाताओं का ऐतिहासिक जुड़ाव भी टूट जाएगा।

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हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी पर संकट
माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति के सदस्यों ने समिति को बताया कि रोपवे परियोजना से कटड़ा और आसपास के इलाकों में हजारों परिवारों की आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा। घोड़ा, पिट्ठू और पालकी सेवाएं महज़ रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरागत जीविका हैं। रोपवे के बाद इन सेवाओं की मांग घटेगी और सैकड़ों लोग बेरोजगार हो जाएंगे।

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20 लाख रुपये मुआवजे की मांग
घोड़ा-पिट्ठू-पालकी यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह जमवाल ने आरोप लगाया कि वर्षों से मजदूरों को सिर्फ आश्वासन दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन रोपवे लगाकर इन सेवाओं को समाप्त करना चाहता है, तो प्रत्येक प्रभावित मजदूर को कम से कम 20 लाख रुपये का सम्मानजनक मुआवजा दिया जाए, ताकि वे अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर सकें।

‘विकास के नाम पर स्थानीय लोगों की अनदेखी’
प्रतिनिधियों ने यह भी आरोप लगाया कि रोपवे परियोजना से बड़े कॉरपोरेट और ठेकेदारों को लाभ होगा, जबकि स्थानीय मेहनतकश वर्ग इसकी कीमत चुकाएगा। उन्होंने मांग की कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले स्थानीय जनता, धार्मिक संगठनों और सेवा प्रदाताओं की राय को गंभीरता से शामिल किया जाए।

समिति का आश्वासन, सभी पहलुओं पर होगा विचार
उच्चस्तरीय समिति के सदस्यों ने प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया कि रोपवे परियोजना पर कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले श्रद्धालुओं की आस्था, स्थानीय रोजगार और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखा जाएगा।

बैठक में माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति के अध्यक्ष बलिराम राणा, भाजपा के पूर्व राज्य मंत्री अजय नंदा, कांग्रेस के पूर्व मंत्री जुगल किशोर, कांग्रेस नेता राजेश सदोत्रा, भाजपा नेता प्रभात सिंह मंगली सहित विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के बड़ी संख्या में नेता-कार्यकर्ता मौजूद रहे।

‘न आस्था से समझौता, न रोज़गार पर चोट’
संगठनों ने एक स्वर में कहा कि वे न तो आस्था से खिलवाड़ होने देंगे और न ही स्थानीय रोजगार पर प्रहार। उनका आरोप है कि श्राइन बोर्ड दिव्यांग, बुजुर्ग और बीमार श्रद्धालुओं के नाम पर सुविधाओं की बात करता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन वर्गों को हेलीकॉप्टर या बैटरी कार के टिकट भी मुश्किल से मिलते हैं। इसके बजाय, वीआईपी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। रोपवे को लेकर बढ़ता विरोध अब साफ संकेत दे रहा है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में धार्मिक आस्था, रोजगार और विकास के टकराव का बड़ा केंद्र बन सकता है।

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