जग्गी हत्याकांड: अमित जोगी को सुप्रीम संजीवनी, हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक, गिरफ्तारी भी टली

जग्गी हत्याकांड: अमित जोगी को सुप्रीम संजीवनी, हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक, गिरफ्तारी भी टली

रायपुर (NJV Desk) छत्तीसगढ़ के सियासी इतिहास के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल रामअवतार जग्गी हत्याकांड (Jaggi Murder Case) में एक बार फिर बड़ा ट्विस्ट आ गया है। इस मामले में आजीवन कारावास की सजा का सामना कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) से एक बड़ी संजीवनी मिली है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा और सरेंडर के सख्त फरमान पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 'ब्रेक' लगा दिया है। यानी, अमित जोगी की गिरफ्तारी और जेल जाने के संकट पर फौरी तौर पर विराम लग गया है।

इस नए घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में अचानक सरगर्मी बढ़ा दी है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद बैकफुट पर आई जोगी कांग्रेस (JCC-J) और अमित जोगी के समर्थकों को इस अंतरिम राहत से एक बड़ा संबल मिला है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, CBI से मांगा जवाब

हाईकोर्ट ने 6 अप्रैल को जो फैसला सुनाया था, वह जोगी परिवार के लिए किसी सियासी और कानूनी भूकंप से कम नहीं था। कोर्ट ने अमित जोगी को 3 हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का अल्टीमेटम दिया था। समय तेजी से बीत रहा था और गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी। इसी बीच अमित जोगी ने देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख किया।

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सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों की कड़ियों का संज्ञान लेते हुए जोगी को अंतरिम राहत प्रदान की। इसके साथ ही, कोर्ट ने देश की प्रमुख जांच एजेंसी CBI को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। जोगी के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में मजबूत दलील पेश करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ हत्या की साजिश में शामिल होने के कोई पुख्ता और सीधे साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।

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अमित जोगी की ओर से मुख्य रूप से दो आदेशों को चुनौती दी गई थी। पहला, जिसमें CBI को इस मामले में हाईकोर्ट में अपील करने की विशेष अनुमति दी गई थी और दूसरा, हाईकोर्ट का वह हालिया आदेश जिसमें उन्हें हत्या (IPC की धारा 302) और आपराधिक साजिश (120-बी) का दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब इन दोनों ही अपीलों को एक साथ (क्लब) कर लिया है और अगली सुनवाई तक सरेंडर के आदेश पर पूरी तरह स्टे लगा दिया है।

इस पूरी कानूनी जंग की जड़ें 21 साल पुरानी हैं। 4 जून 2003 की रात राजधानी रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता रामअवतार जग्गी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। चुनावी साल में हुए इस हत्याकांड ने नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया था।

मामले की जांच जब आगे बढ़ी, तो इसकी आंच सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निवास तक पहुंची और उनके बेटे अमित जोगी को मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया। कानूनी दांव-पेंच के इस लंबे सफर में शुरुआत में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए अमित जोगी को बरी कर दिया था।

सियासी गलियारों में हलचल तेज

निचली अदालत के फैसले के खिलाफ CBI और जग्गी परिवार ने लंबी लड़ाई लड़ी, जिसका नतीजा 6 अप्रैल को हाईकोर्ट के फैसले के रूप में दिखा, जब कोर्ट ने अमित जोगी को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के 'स्टे ऑर्डर' ने पूरी कहानी का रुख फिर मोड़ दिया है।

छत्तीसगढ़ की सियासत में इस आदेश के दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं। एक तरफ जोगी समर्थकों में जश्न और राहत की लहर है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल और विपक्ष की निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि अब CBI सुप्रीम कोर्ट में अपना क्या बचाव पेश करती है। फिलहाल के लिए अमित जोगी ने गिरफ्तारी के फंदे को टाल दिया है, लेकिन असल कानूनी 'क्लाइमेक्स' अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से ही तय होगा।

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