कलेक्टोरेट में सुपर कलेक्टर का रसूख, ट्रांसफर-पोस्टिंग की समानांतर सरकार चला रहे अधीक्षक, जांच की आंच से हर बार बच निकलने का हुनर

 

बिलासपुर। बिलासपुर के सरकारी महकमे में इन दिनों एक ही सवाल दौड़ लगा रहा है रहा है— क्या कानून- नियम- अनुशासन सिर्फ सामान्य कर्मचारियों के लिए हैं? भू-अभिलेख शाखा में पिछले 6 वर्षों से कुंडली मारकर बैठे अधीक्षक खिलेंद्र सिंह यादव का मामला अब केवल एक अधिकारी की लंबी पदस्थापना का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की लाचारी की पहचान बन गया है। कलेक्टर को मिली हालिया शिकायत ने उस सिंडिकेट की परतें खोल दी हैं, जो मलाईदार कुर्सियों पर कब्ज़ा जमाए रखने के लिए शासन की आंखों में धूल झोंकने से भी गुरेज नहीं करता।

तीन साल का नियम मगर छह साल से जलवा 

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छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के स्पष्ट निर्देश हैं कि संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारियों का तबादला हर तीन साल में अनिवार्य है ताकि पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन अधीक्षक यादव ने इस नियम को अपनी 'सेटिंग' के दम पर ठेंगा दिखा दिया है। ताज्जुब की बात यह है कि जब भी उनके तबादले की फाइल हिली, अदृश्य शक्तियों ने उसे वापस पटरी पर ला दिया। पचपेड़ी ट्रांसफर होने के बावजूद रातों-रात आदेश का बदल जाना यह सिद्ध करता है कि कलेक्टोरेट के भीतर एक ऐसी 'समानांतर सत्ता' सक्रिय है जो सीधे मंत्रालय तक के आदेशों को बेअसर करने की क्षमता रखती है।

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सस्पेंशन से लेकर बहाली तक: जुगाड़ का मास्टरस्ट्रोक

जुलाई 2023 का डेटा चोरी कांड किसी भी लोक सेवक के करियर पर पूर्णविराम लगाने के लिए काफी था। भर्ती परीक्षा की मेरिट सूची पेन ड्राइव में चुराने के गंभीर आरोप और तत्कालीन कलेक्टर द्वारा की गई निलंबन की कार्रवाई भी यादव के रसूख को डिगा नहीं सकी। प्रशासनिक गलियारों में यह चुटकी ली जा रही है कि साहब के पास शायद वह 'पारस पत्थर' है, जिससे छूते ही निलंबन का दाग धूल जाता है और राजधानी से वापस उसी कुर्सी पर वापसी का रास्ता साफ हो जाता है।

वसूली का कॉर्पोरेट मॉडल 

शिकायत में उल्लेखित तथ्य चौंकाने वाले हैं। भू-अभिलेख विभाग, जो जमीन के रिकॉर्ड का संरक्षक होता है, उसे कथित तौर पर एक 'ट्रेडिंग सेंटर' में तब्दील कर दिया गया है। सीमांकन से लेकर डायवर्सन और पटवारियों की मनचाही पोस्टिंग तक, हर फाइल की एक 'अघोषित कीमत' तय होने के आरोप हैं। चर्चा है कि इस खेल में यादव ने शहर के कुछ रसूखदारों और रंगे-पुते 'कलमकारों' का एक ऐसा रक्षा कवच तैयार किया है, जो किसी भी शिकायत को जांच की चौखट तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़वा देता है।

कुर्सी से ऐसा प्रेम कि लैला-मजनू भी शर्मा जाएं

ऐसा लगता है कि अधीक्षक महोदय और उनकी कुर्सी के बीच वह फेविकोल का जोड़ है जो सरकारों के बदलने से भी नहीं टूटता। छत्तीसगढ़ में जहां बड़े-बड़े आईएएस अफसरों के विभाग बदल गए, वहां यादव जी का भू-अभिलेख प्रेम मिसाल बन गया है। शायद विभाग को डर है कि उनके जाते ही बिलासपुर का नक्शा ही कहीं लापता न हो जाए, इसलिए नियम और नैतिकता को ताक पर रखकर उन्हें पद पर बनाए रखना शासन की मजबूरी बन गया है।

अब गेंद कलेक्टर संजय अग्रवाल के पाले में है। क्या वे इस अंगद के पांव को हिला पाएंगे या फिर यह शिकायत भी पुरानी फाइलों की तरह अधीक्षक के रसूख की अलमारी में दफन हो जाएगी?

लेखक के विषय में

मनीशंकर पांडेय Picture

मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।

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