रायपुर KTUJM विवाद: जिस प्रोफेसर पर यूनिवर्सिटी ने दर्ज कराई थी FIR, अब चोर दरवाजे से उसी की वापसी! सेटिंग और राजनीतिक रसूख पर उठे गंभीर सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (KTUJM) इन दिनों शिक्षा से ज्यादा अपनी कथित 'सेटिंग और संरक्षण' की कार्यप्रणाली को लेकर सुर्खियों में है। विश्वविद्यालय परिसर में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, पूर्व में गंभीर दस्तावेजी अनियमितताओं के आरोप में टर्मिनेट किए गए प्रोफेसर शाहिद अली की गुपचुप तरीके से 'चोर दरवाजे' से वापसी की तैयारी चल रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति पर खुद विवि प्रशासन ने फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया था, उसे अब किस 'अदृश्य दबाव' के तहत दोबारा कुर्सी सौंपी जा रही है?

गंभीर आरोपों में हुए थे टर्मिनेट
सूत्रों के मुताबिक, प्रोफेसर शाहिद अली को पूर्व में नियमों की अनदेखी और दस्तावेजी गड़बड़ियों के चलते सेवा से बर्खास्त (टर्मिनेट) किया गया था। बात सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई तक ही नहीं रुकी थी, बल्कि विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा कसते हुए मामला भी दर्ज कराया था। ऐसे दागी अतीत वाले प्रोफेसर की अचानक 'बैकडोर एंट्री' की सुगबुगाहट ने पूरे कैंपस का माहौल गरमा दिया है।
लेन-देन और रसूखदारों के आशीर्वाद की चर्चा
कैंपस में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि यह बहाली किसी नियम-कायदे के तहत नहीं, बल्कि भारी 'लेन-देन' और 'सेटिंग' का नतीजा है। आरोप यह भी लग रहे हैं कि एक प्रभावशाली संवैधानिक पद पर बैठे नेता और उनके करीबी अधिकारियों के 'आशीर्वाद' से यह पूरी पटकथा लिखी गई है। प्रक्रिया इतनी गोपनीय रखी गई है कि न तो कोई सार्वजनिक आदेश जारी हुआ है और न ही आधिकारिक जानकारी दी गई है। सब कुछ बंद कमरों की बैठकों में तय किया जा रहा है।
विवि प्रशासन की नीयत पर उठ रहे ये 5 बड़े सवाल
सवाल 1: यदि पूर्व में प्रोफेसर पर हुई बर्खास्तगी की कार्रवाई और दर्ज एफआईआर सही थी, तो अब उनकी बहाली कैसे उचित हो सकती है?
सवाल 2: अगर अब उन्हें निर्दोष मानकर बहाल किया जा रहा है, तो क्या पहले की गई प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई सिर्फ एक दिखावा थी?
सवाल 3: जिस व्यक्ति पर यूनिवर्सिटी ने ही केस किया, उसकी वापसी के लिए क्या विवि ने अपनी ही जांच कमेटियों को झुठला दिया है?
सवाल 4: क्या शिक्षा के इस मंदिर में अब नियुक्तियां और बहालियां योग्यता के बजाय 'राजनीतिक पहुंच' और अटैची के वजन से तय होंगी?
सवाल 5: पारदर्शिता का दावा करने वाला विश्वविद्यालय प्रशासन इस पूरी प्रक्रिया को गुपचुप तरीके से क्यों अंजाम दे रहा है? फाइलें सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रहीं?
संस्थान की साख पर बट्टा
शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का स्पष्ट कहना है कि यदि यह वापसी होती है, तो यह विश्वविद्यालय की साख पर सबसे बड़ा धब्बा होगा। इससे छात्र-छात्राओं और प्रोफेसरों के बीच सीधा संदेश जाएगा कि अगर आपकी रसूखदारों तक पहुंच है, तो नियम-कायदों को आसानी से जेब में रखा जा सकता है।
