पीएमजीएसवाई के मुख्य अभियंता का एसटी प्रमाण पत्र निरस्त: महाराष्ट्र के मूल निवासी ने दशकों तक उठाया छत्तीसगढ़ में आरक्षण का 'लाभ', अब रिकवरी की उठने लगी मांग

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था में सेंधमारी का एक बेहद संगीन और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दशकों तक सिस्टम की आंखों में धूल झोंककर, अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के हकों पर कुंडली मारकर बैठे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के मुख्य अभियंता (ईएनसी) के.के. कटारे का जाति प्रमाण पत्र अंततः निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया गया है।

कमाल की बात यह है कि पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के मूल निवासी होने के बावजूद कटारे साहब ने छत्तीसगढ़ में एसटी कोटे की मलाई बखूबी काटी। राज्य की उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति ने 26 फरवरी 2026 को जारी अपने कड़े आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि कटारे को छत्तीसगढ़ राज्य में एसटी आरक्षण का लाभ लेने की कोई संवैधानिक पात्रता नहीं है।

शिकायतों के बाद खुली फाइलें, सामने आया सच

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यह पूरा मामला जागरूक नागरिकों की शिकायतों के बाद परत-दर-परत खुला। शिकायतकर्ता विनोद बोडकर, विजय मिश्रा और राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष वीरेंद्र बोरकर ने इस गंभीर फर्जीवाड़े की शिकायत उच्च स्तरीय समिति से की थी। इसके बाद जब राज्य सरकार के आदिम जाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक विकास विभाग तथा कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने फाइलों की धूल झाड़ी और समिति से पत्राचार किया, तब जाकर इस मामले की विधिवत जांच शुरू हो सकी।

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जांच के दौरान छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि कटारे के पिता 1962 से 1993 तक अविभाजित मध्यप्रदेश में शासकीय सेवा में रहे थे। लेकिन मामला तब फंसा जब कटारे द्वारा प्रस्तुत उनके पिता के कोषालय पेंशन दस्तावेजों में 'ग्राम एवं पोस्ट तुमसर, जिला भंडारा (महाराष्ट्र)' का पता दर्ज मिला। समिति की सुनवाई के दौरान कटारे ने अपनी सफाई में अविभाजित मध्यप्रदेश और उसकी तत्कालीन राजधानी नागपुर का पूरा भूगोल समझाते हुए यह तर्क जरूर दिया कि उनके पिता 1953 से बालाघाट में निवास कर नौकरी कर रहे थे।

इसी आधार पर 1978 में तहसील वारासिवनी, जिला बालाघाट (मध्यप्रदेश) से उन्हें जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया था। लेकिन, वे समिति के समक्ष ऐसा एक भी पुख्ता साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह नाकाम रहे जो यह साबित कर सके कि उनके पूर्वज 10 अगस्त 1950 से पहले मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ की भौगोलिक सीमा के मूल निवासी थे। वर्तमान में उनकी जाति संबंधी जांच मध्यप्रदेश में भी लंबित होने की जानकारी सामने आई है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का कड़ाई से पालन

समिति ने अपने आदेश में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों तथा संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का हवाला देते हुए स्थिति एकदम साफ कर दी। सुप्रीम कोर्ट की स्थापित गाइडलाइन स्पष्ट कहती है कि यदि कोई व्यक्ति एक राज्य का अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य है और रोजगार या शिक्षा के उद्देश्य से दूसरे राज्य में पलायन करता है, तो वह वहां के आरक्षित वर्ग का लाभ नहीं ले सकता।

हालांकि, जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि तुमसर नगर पालिका के वर्ष 1935 के जन्म पंजीयन रजिस्टर में कटारे के दादा का नाम दर्ज है, जिससे यह साबित हुआ कि उनकी जाति को लेकर कोई संदेह नहीं है। लेकिन उनका मूल निवास वर्तमान महाराष्ट्र राज्य की भौगोलिक सीमा में आने के कारण छत्तीसगढ़ के कोटे पर उनका कोई अधिकार नहीं बनता। नतीजतन, 1978 में नायब तहसीलदार वारासिवनी द्वारा जारी प्रमाण पत्र को रद्दी के कागज के समान मानते हुए निरस्त करने योग्य ठहराया गया है। समिति ने संबंधित विभागों को आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश भी दे दिए हैं।

भ्रष्टाचार की फाइलों पर 'अदृश्य' संरक्षण का साया?

इस पूरे प्रकरण का सबसे विचारणीय पहलू यह है कि एक अधिकारी दूसरे राज्य का होकर भी यहां करोड़ों रुपये का लाभ लेता रहा और सिस्टम दशकों तक मौन साधे बैठा रहा। अब यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि आरक्षण का अवैध लाभ उठाकर उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार को जो करोड़ों का चूना लगाया है, उसकी वसूली कब की जाएगी?

क्या यह महज इत्तेफाक है कि कटारे के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) और एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) द्वारा मारे गए छापों की फाइलें आज भी ठंडे बस्ते में आराम फरमा रही हैं? आखिर वह कौन सा 'अदृश्य संरक्षण' है जो जांच एजेंसियों के हाथ बांधे हुए है? यह आशंका भी बेमानी नहीं है कि इन फाइलों के बीच कोई अघोषित 'लेन-देन' का दीमक लगा हुआ हो।

सुशासन का दावा करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार को अब इस बात की भी गहन जांच करनी चाहिए कि इतने वर्षों तक इस धांधली को किसका अभयदान प्राप्त था। प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को गारंटी दी थी कि भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वे कितने भी रसूखदार या शक्तिशाली क्यों न हों। अब देखना यह है कि यह 'मोदी गारंटी' कटारे के इस हाई-प्रोफाइल मामले में कितनी कारगर साबित होती है और दोषियों के खिलाफ क्या सख्त कार्रवाई होती है।

इस पूरे घोटाले को 'राष्ट्रीय जगत विजन' ने शुरुआत से ही प्रमुखता से प्रकाशित कर उजागर किया था, जिसका असर आज इस आदेश के रूप में सामने है। आगे भी इस तरह के भ्रष्टाचार के मामलों को बेनकाब करने का सिलसिला जारी रहेगा।

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