डॉल्फिन स्कूल पार्ट 2 बनने की राह पर नारायणा ई-टेक्नो स्कूल: बिना लोकल गारंटर राज्य से पलायन की बड़ी साजिश!

डॉल्फिन स्कूल पार्ट 2 बनने की राह पर नारायणा ई-टेक्नो स्कूल: बिना लोकल गारंटर राज्य से पलायन की बड़ी साजिश!

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर सहित प्रदेश के कई अन्य शहरों में संचालित 'नारायणा ई-टेक्नो स्कूल' (Narayana e-Techno School) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक खुलासा सामने आया है। हाल ही में सीबीएसई की फर्जी मान्यता का झांसा देकर बच्चों को राज्य बोर्ड (CG Board) की परीक्षा दिलाने के विवाद में घिरे इस स्कूल पर अब एक और बड़े घोटाले के बादल मंडरा रहे हैं। अभिभावकों और शिक्षा जगत में अब यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि क्या नारायणा स्कूल भी बहुचर्चित डॉल्फिन स्कूल पार्ट 2 बनने की राह पर है? बिना किसी ठोस स्थानीय आधार और लोकल गारंटर के, स्कूल की यह कार्यप्रणाली किसी बड़े वित्तीय फ्रॉड और अचानक राज्य से पलायन की गहरी साजिश की ओर इशारा कर रही है।

 

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महज लीज के भवन पर करोड़ों का कारोबार

 

NJV की पड़ताल और ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, इस बड़े ब्रांड वाले स्कूल का न तो अपना कोई स्थायी भवन है और न ही शहर में कोई ठोस संपत्ति या इंफ्रास्ट्रक्चर। स्कूल का पूरा संचालन महज एक लीज (किराए) के भवन से किया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि कल को कोई बड़ा विवाद होता है या स्कूल प्रबंधन रातों-रात ताला लगाकर गायब हो जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? छत्तीसगढ़ के लोग डॉल्फिन स्कूल प्रकरण को अभी भूले नहीं हैं, जहां अभिभावकों की गाढ़ी कमाई और बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया था और प्रबंधन रातों-रात सब कुछ समेट कर रफूचक्कर हो गया था।

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स्थानीय बैंक खाता गायब, सीधे नेल्लोर और मुंबई पहुंच रही रकम

 

इस पूरे मामले में सबसे बड़ी खतरे की घंटी स्कूल के वित्तीय लेनदेन और फीस ढांचे को लेकर बज रही है। यह बेहद हैरान करने वाला तथ्य है कि बिलासपुर जैसे शहर में हजारों छात्रों से करोड़ों रुपये की मोटी फीस वसूलने वाले इस स्कूल का स्थानीय स्तर पर कोई स्वतंत्र या मुख्य बैंक खाता (Independent Local Bank Account) संचालित नहीं है। अभिभावकों द्वारा अपनी खून-पसीने की कमाई से जमा की गई फीस का एक-एक रुपया स्थानीय स्तर पर रुकने के बजाय सीधे नेल्लोर (आंध्र प्रदेश) या मुंबई स्थित केंद्रीय बैंक खातों में ट्रांसफर हो रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि स्कूल का सारा पैसा सुरक्षित तरीके से प्रदेश के बाहर भेजा जा रहा है।

लोकल गारंटर का अभाव: भाग गए तो कौन करेगा भरपाई?

नियमों और व्यावसायिक नैतिकता के तहत बाहरी शिक्षण संस्थाओं को राज्य में काम करने के लिए एक जवाबदेह स्थानीय प्रतिनिधि, ट्रस्टी या मजबूत गारंटर की आवश्यकता होती है। लेकिन नारायणा स्कूल के मामले में स्थानीय स्तर पर किसी भी जिम्मेदार प्रतिनिधि या 'लोकल गारंटर' का अभाव है। यदि भविष्य में कोई विपरीत परिस्थिति बनती है और स्कूल प्रबंधन राज्य छोड़कर भागने का फैसला करता है, तो अभिभावकों के करोड़ों रुपयों के भारी नुकसान की भरपाई करने वाला यहां कोई नहीं होगा। स्थानीय प्रशासन के पास भी ऐसी कोई कानूनी सिक्योरिटी (Security Deposit) नहीं है, जिससे पैरेंट्स का पैसा सुरक्षित वापस कराया जा सके।

 

शिक्षा विभाग और प्रशासन की चुप्पी पर उठते सवाल

हाल ही में जब बिलासपुर में स्कूल की मान्यता का फर्जीवाड़ा सामने आया था, तब आक्रोशित परिजनों ने कलेक्टर बंगले तक पहुंचकर भारी हंगामा किया था। लेकिन प्रशासन ने केवल जांच टीम बनाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। अब पलायन और वित्तीय अनियमितता की इस बड़ी आशंका ने अभिभावकों की नींद उड़ा दी है। शिक्षा विभाग की नाक के नीचे चल रहे इस खतरनाक खेल पर अधिकारियों की खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।समय रहते यदि जिला प्रशासन, राज्य सरकार और शिक्षा महकमा नहीं जागा, तो बिलासपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ के हजारों अभिभावकों का पैसा और मासूम बच्चों का भविष्य पूरी तरह से अंधकार में डूब जाएगा। 

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