फसल बीमा का उलझा गणित: प्रीमियम भरने के बाद भी 'औसत' की भेंट चढ़ रहा मुआवजा, दो साल में 73 लाख किसानों ने किया किनारा

फसल बीमा का उलझा गणित: प्रीमियम भरने के बाद भी 'औसत' की भेंट चढ़ रहा मुआवजा, दो साल में 73 लाख किसानों ने किया किनारा

रायपुर। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आई तो थी किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच बनकर। मगर, जब से इस योजना को स्वैच्छिक किया गया है, कई राज्यों के किसानों का इससे मोहभंग होने लगा है। हालत यह है कि महज दो साल के भीतर 73 लाख (29.6%) किसान इस योजना से बाहर हो चुके हैं। सबसे बड़ी वजह वही पुरानी है—क्लेम के आकलन का उलझा हुआ तरीका, पैसे मिलने में होने वाली देरी और असल नुकसान की तुलना में कम मुआवजा मिलना।

फसल बीमा योजना की शुरुआत 2016 में हुई थी। इसके प्रचार-प्रसार पर 10 साल के भीतर 664 करोड़ रुपए खर्च किए गए। शुरुआती दौर में जिन किसानों ने कर्ज लिया था, उनके लिए यह बीमा अनिवार्य था। बैंक खुद ही फसल बिकने के पैसे से प्रीमियम काट लिया करते थे। साल 2020 में जब इसे स्वैच्छिक किया गया, तब से किसानों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी। साल 2023 में देश भर में 3.14 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि बीमित थी, जो अब घटकर करीब 2.18 करोड़ हेक्टेयर ही रह गई है।

 

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सैटेलाइट का वह गणित, जिसमें फंसता है किसान

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कृषि बीमा विशेषज्ञ कमलजी सहाय इस पूरी प्रक्रिया की खामी की ओर इशारा करते हैं। नुकसान का आकलन सैटेलाइट से होता है। अगर सैटेलाइट के आकलन में किसी इलाके का औसत नुकसान 40% निकलता है, तो वहां के किसी भी किसान को 40% से ज्यादा का क्लेम नहीं मिलेगा। भले ही उस किसान की 100% फसल बर्बाद क्यों न हो गई हो।

ऊपर से क्लेम सेटलमेंट में लगने वाला वक्त। सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली के चलते किसानों को क्लेम के लिए साल-साल भर का इंतजार करना पड़ता है। योजना की दूसरी बड़ी खामी बटाईदार किसानों का इससे बाहर होना है। देश में करीब आधे किसान बटाई पर खेती करते हैं। जमीन के कागज उनके नाम पर होते नहीं, लिहाजा कंपनियां उन्हें बीमा नहीं देतीं। इन्हीं दिक्कतों के चलते बंगाल, बिहार और गुजरात जैसे राज्यों ने अपनी खुद की योजनाएं चलानी शुरू कर दी हैं।

आंकड़े जो कहानी खुद कहते हैं

जिन राज्यों से किसान इस योजना को छोड़ रहे हैं, उनमें से टॉप-6 राज्य भाजपा/एनडीए शासित हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है।

राज्यों में घटे किसानों की संख्या (पिछले दो साल में):

 * महाराष्ट्र: 36.83 लाख किसान घटे

 * आंध्र प्रदेश: 14.75 लाख किसान घटे

 * राजस्थान: 6.79 लाख किसान घटे

 * उत्तर प्रदेश: 6.15 लाख किसान घटे

 * ओडिशा: 4.31 लाख किसान घटे

 * असम: 2.18 लाख किसान घटे

 * हरियाणा: 1.72 लाख किसान घटे

सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2019-20 से 2024-25 तक किसानों को 1.03 लाख करोड़ रुपए का फसल बीमा दिया गया, जिसके एवज में किसानों ने सिर्फ 19,463 करोड़ रुपए का प्रीमियम भरा। यह आंकड़े सुनने में बड़े आकर्षक लगते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि खरीफ फसल की प्रति एकड़ 2000 रुपए की प्रीमियम में किसान सिर्फ 20% भरते हैं, बाकी 40-40% राज्य और केंद्र सरकार देती है। इसे मिला लिया जाए तो कुल प्रीमियम 1.10 लाख करोड़ रुपए पहुंच जाती है।

मतलब, योजना के लिए सूचीबद्ध 18 बीमा कंपनियों (जिनमें 5 सरकारी हैं) को प्रीमियम तो पूरा मिल रहा है, लेकिन जब मुआवजे की बारी आती है, तो किसान सैटेलाइट के औसत और सर्वे के पचड़े में उलझ कर रह जाता है।

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