बिलासपुर पुलिस में 'सिफारिश राज' का आरोप: सुशासन के दावों पर सवालिया निशान!

थानों में रसूखदार आरक्षकों का दबदबा, कप्तान की साख खतरे में; क्या सत्ता के गलियारों से मिल रहा आशीर्वाद?

बिलासपुर पुलिस में 'सिफारिश राज' का आरोप: सुशासन के दावों पर सवालिया निशान!

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार जहां एक ओर "सुशासन" के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं बिलासपुर पुलिस महकमे से सामने आ रही जमीनी हकीकत इन दावों पर सवालिया निशान खड़े कर रही है। आरोप है कि पुलिस विभाग में थानों पर पोस्टिंग का खेल विभागीय नियमों का खुला उल्लंघन कर रहा है, जिससे शासन-प्रशासन की साख दांव पर लगी है। यह स्थिति ऐसे समय में बन रही है जब राज्य की पुलिस व्यवस्था पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल में भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी।

थानों का 'ठेका': रसूखदार आरक्षकों का एकछत्र साम्राज्य

सिविल लाइन, सिरगिट्टी और तारबाहर  साइबर सेल जैसे बिलासपुर के प्रमुख थानों में कुछ खास आरक्षकों के वर्षों से जमे होने की खबरें सामने आ रही हैं। सूत्रों की मानें तो तबादला आदेशों के बावजूद ये आरक्षक हर बार अपनी पसंदीदा पोस्टिंग पर लौट आते हैं, मानो थाने उनकी 'खानदानी जागीर' हों। कथित तौर पर ये आरक्षक खुलेआम दावा करते हैं कि "बस कवर्धा से एक फोन लगेगा, फिर अपनी कुर्सी पर लौट आएंगे!" यह बयान सीधे तौर पर प्रदेश की सत्ता के ऊपरी गलियारों से 'आशीर्वाद' मिलने की ओर इशारा करता है, जो गंभीर चिंता का विषय है।

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कप्तान की साख खतरे में: क्या एसएसपी के हाथ बंधे हैं?

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बिलासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) रजनेश सिंह को एक सख्त और ईमानदार अधिकारी के रूप में जाना जाता है। ऐसे में उनके नेतृत्व में जब थानों पर 'सेटिंग' और 'रसूख' का खेल फल-फूल रहा है, तो उनकी साख पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या कप्तान चाहकर भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं? या फिर उनके हाथ प्रदेश की राजनीतिक सत्ता ने बांध दिए हैं? जब आदेशों को धता बताकर आरक्षक सत्ताधारी नेताओं की शह पर अपनी पसंदीदा पोस्टिंग हथियाते रहते हैं, तब प्रशासन की वास्तविक ताकत पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

खुली चुनौती: लाइन हाजिर के बाद भी दबंगई!

हाल ही में तारबाहर थाना क्षेत्र में सट्टा खाईवालों से सांठगांठ और लाखों रुपये की वसूली के आरोप में एक आरक्षक को लाइन हाजिर किया गया था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि यही आरक्षक अब खुलेआम दावा कर रहा है कि "बस एक फोन आएगा और हम दोनों दोस्त सीधे साइबर रेंज पहुंच जाएंगे!" यह घटना दर्शाती है कि क्या लाइन हाजिर होना अब सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गया है? क्या दोषियों को दंड की जगह 'इनाम' मिलना तय है?

थाने या वसूली के केंद्र? विभागीय चर्चा गरम

विभाग के भीतर यह मुद्दा गरमाया हुआ है कि कुछ खास आरक्षक बिना अपने पसंदीदा 'दोस्तों' के काम ही नहीं करते, यानी उनकी पूरी पोस्टिंग, ड्यूटी और योजना 'कमाई' पर आधारित है। यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस थाने अब सिर्फ सुविधा केंद्र या वसूली के अड्डे बन चुके हैं? क्या पुलिसिंग अब सेवा का नहीं, बल्कि 'कलेक्शन' का नया नाम है?

अतीत का आईना: महादेव ऐप की छांव में पनपी बीमारी

यह स्थिति कांग्रेस शासनकाल में महादेव ऑनलाइन सट्टा ऐप जैसे बड़े घोटालों के दौरान पनपी बीमारी की याद दिलाती है, जब आरक्षक और अधिकारी अपनी 'सेटिंग' और सांठगांठ के दम पर मलाईदार पोस्टिंग हथियाते रहे। उन्हीं सिफारिशों ने पूरे पुलिस तंत्र को अंदर से खोखला कर दिया था, जिसकी आंच सीधे मुख्य सचिवालय और अफसरशाही तक पहुंची थी। अब जब भाजपा की सत्ता है, तब बदलाव की उम्मीद थी, पर बिलासपुर से उभर रही तस्वीर बेहद चिंताजनक है।

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शासन-प्रशासन के लिए आखिरी मौका!

यदि राज्य सरकार और वरिष्ठ पुलिस नेतृत्व अब भी नहीं चेतते हैं, तो इसका असर केवल पुलिस महकमे की साख पर नहीं, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था पर पड़ेगा। सिफारिश के इस खेल से ईमानदार अफसरों का मनोबल टूटता है और आम जनता का विश्वास प्रशासन से पूरी तरह उठ जाता है। यह वक्त है कि शासन-प्रशासन तय करे कि वे वर्दी की इज्जत को फिर से बहाल करना चाहते हैं या रसूख और सिफारिश के आगे घुटने टेकने को तैयार हैं। सुशासन का वादा निभाएं, अन्यथा जनता के गुस्से के लिए तैयार रहें।

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