Supreme Court: कुलदीप सेंगर केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिल्ली हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने का आदेश

Supreme Court: कुलदीप सेंगर केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिल्ली हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने का आदेश

दिल्ली: उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट को समयबद्ध निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि इस मामले में लंबित अपीलों पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई हो और तीन महीने के भीतर अंतिम फैसला सुनाया जाए। यह आदेश निष्कासित भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

दरअसल, कुलदीप सिंह सेंगर को इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई थी। सेंगर ने दिल्ली हाईकोर्ट में सजा निलंबन की मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामला गंभीर है और इसमें देरी न्याय के हित में नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें हाईकोर्ट को “आउट ऑफ टर्न” सुनवाई करनी चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि अपील को प्राथमिकता दी जाए और यदि आवश्यक हो तो हाईकोर्ट बेंच का पुनर्गठन भी कर सकता है, लेकिन तय समयसीमा के भीतर फैसला आना चाहिए।

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सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष की ओर से यह भी बताया गया कि उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अलग से अपील दायर की है, जिसमें सजा की अवधि और धाराओं को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रिकॉर्ड पर लेते हुए कहा कि चूंकि हाईकोर्ट के आदेश में इस अपील का उल्लेख नहीं है, इसलिए वह इस पर टिप्पणी नहीं कर रहा है, लेकिन हाईकोर्ट दोनों अपीलों पर शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करे।

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कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि कुलदीप सिंह सेंगर पहले से ही उन्नाव दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। ऐसे में उसके खिलाफ अन्य मामलों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट कहा कि समय बीत जाने के बावजूद यह मामला केवल कानूनी औपचारिकता नहीं बन जाता, बल्कि पीड़ित परिवार के लिए न्याय की उम्मीद अब भी जीवित रहती है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ डेव ने सेंगर की ओर से और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीबीआई की तरफ से पक्ष रखा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पीड़िता की ओर से दायर क्रॉस-अपील को भी हाईकोर्ट में साथ-साथ सुना जाए।

इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया में चल रही बहसों और सार्वजनिक बयानबाजी पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को अदालत के भीतर ही रहने दिया जाना चाहिए और वकीलों को कोर्ट के बाहर अनावश्यक प्रचार से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब सभी की निगाहें दिल्ली हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह मामला तय समय में निर्णायक मोड़ लेने की ओर बढ़ेगा।

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