‘नो वर्क नो पे’ पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: काम करने को तैयार कर्मचारी को मिलेगा पूरा वेतन

‘नो वर्क नो पे’ पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: काम करने को तैयार कर्मचारी को मिलेगा पूरा वेतन

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी काम करने के लिए तैयार है लेकिन प्रशासनिक कारणों से उसे काम नहीं दिया जाता, तो उस स्थिति में उस पर ‘नो वर्क नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए एकलपीठ के पहले दिए गए आदेश को निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ताओं को बैक वेज (पिछला वेतन) सहित सेवा से जुड़े अन्य लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।

फॉरेस्ट गार्ड भर्ती से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला वन विभाग में फॉरेस्ट गार्ड की भर्ती प्रक्रिया से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं में रीवा निवासी राजेश कुमार पांडे सहित कई कर्मचारी शामिल थे।याचिका में बताया गया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1980 में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में हुई थी और उन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक सेवा दी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई नियुक्ति प्रक्रिया
बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित पदों पर नियुक्त करने का निर्णय लिया। इसी क्रम में सितंबर 2008 में वन विभाग ने फॉरेस्ट गार्ड के करीब 1500 रिक्त पदों के लिए अधिसूचना जारी की थी। इनमें से लगभग 1006 पदों पर योग्य उम्मीदवारों की भर्ती की जानी थी।

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परीक्षा पास करने के बाद भी नहीं मिली नियुक्ति
याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन किया और लिखित परीक्षा, साक्षात्कार तथा शारीरिक परीक्षण में सफल भी हुए। इसके बाद दस्तावेज सत्यापन के लिए प्रमाण पत्र जमा करने को कहा गया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें तत्काल नियुक्ति पत्र जारी नहीं किए गए।

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नियुक्ति के बाद रद्द कर दिया गया आदेश
अगस्त 2010 में उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए और मेडिकल व शारीरिक परीक्षण के बाद उन्होंने कार्यभार भी संभाल लिया। हालांकि, महज एक महीने बाद सितंबर 2010 में उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई, जिसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।

मेरिट लिस्ट को लेकर कोर्ट ने पहले भी दिया था निर्देश
हाई कोर्ट ने जुलाई 2011 में फैसला देते हुए कहा था कि जिला स्तर पर मेरिट लिस्ट बनाना सही प्रक्रिया नहीं थी। कोर्ट ने राज्य स्तर पर मेरिट सूची तैयार करने और उसी के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया था। बाद में खंडपीठ ने भी इस आदेश को बरकरार रखा। राज्य सरकार द्वारा इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी अगस्त 2015 में खारिज कर दी गई थी।

कर्मचारियों को मिलेगा बकाया वेतन और अन्य लाभ
ताजा आदेश में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कर्मचारी काम करने के लिए तैयार था, तब उसे काम से वंचित रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में ‘नो वर्क नो पे’ का नियम लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि संबंधित कर्मचारियों को बैक वेज और सेवा से जुड़े सभी वैधानिक लाभ प्रदान किए जाएं।

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