रायपुर के कैफे में मिला था दस बोरी सरकारी चावल दो महीने बाद भी सप्लायर का पता लगाने में विभाग नाकाम

रायपुर के कैफे में मिला था दस बोरी सरकारी चावल दो महीने बाद भी सप्लायर का पता लगाने में विभाग नाकाम

रायपुर की सरकारी राशन दुकानों से गरीबों का चावल खुलेआम निजी संस्थानों तक पहुंच रहा है। दो महीने पहले प्रोफेसर कॉलोनी के एक कैफे से दस बोरी सरकारी चावल जब्त किया गया था। इस मामले में पुलिस और खाद्य विभाग की टीम ने जांच शुरू की थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दो महीने बीत जाने के बाद भी खाद्य विभाग यह पता नहीं लगा सका है कि यह चावल किस राशन दुकान से सप्लाई किया गया था। इस लापरवाही के कारण अब तक किसी भी दोषी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।

जानकारी के मुताबिक गुढ़ियारी इलाके के एक राशन दुकान संचालक ने बिना किसी राशन कार्ड के यह चावल सीधे कैफे में पहुंचाया था। एक साथ इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी चावल का निजी कैफे में मिलना कई बड़े सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि यह चावल कैफे में किस काम के लिए लाया गया था। अधिकारी आज तक इस बात का जवाब नहीं खोज पाए हैं। ऐसे में खाद्य विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर भी कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। बिना किसी मिलीभगत के इतना सारा राशन ब्लैक मार्केट में नहीं जा सकता। गरीबों के हक का राशन इस तरह कैफे में पहुंच जाना सिस्टम की बड़ी नाकामी को दिखाता है।

सरकार राशन दुकानों के जरिए गरीब परिवारों को सस्ता चावल देती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। राशन दुकानों से चावल की हेरफेरी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। राशन माफिया गरीबों का चावल ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। कैफे और होटलों में इस चावल का इस्तेमाल कमर्शियल कामों के लिए हो रहा है। इससे मुनाफाखोरों की जेबें भर रही हैं और गरीब आदमी परेशान हो रहा है। प्रोफेसर कॉलोनी के कैफे का मामला सिर्फ एक उदाहरण है। शहर में कई और जगहें हो सकती हैं जहां सरकारी राशन का गलत इस्तेमाल हो रहा हो।

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रायपुर के खाद्य नियंत्रक भूपेंद्र मिश्रा ने भी इस पूरे मामले पर अपनी बात रखी है। उन्होंने यह बात मानी है कि मौके से दस कट्टा पीडीएस चावल जब्त किया गया था। यह मामला करीब दो महीने पहले उनके संज्ञान में आया था। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि निजी कैफे में चावल किस दुकान से गया था इसका पता अब तक नहीं चल सका है। एक जिम्मेदार अधिकारी का ऐसा बयान जांच प्रक्रिया की सुस्ती को साफ तौर पर उजागर करता है। विभाग के पास पूरी टीम और संसाधन होने के बावजूद दो महीने में एक राशन दुकान का पता न लगा पाना समझ से परे है।

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