बिलासपुर: सिस्टम से सवाल पूछने वाले ‘पत्रकार’ खुद सवालों के कटघरे में... बिरकोना की 'पत्रकार कॉलोनी' आखिर क्यों बन गई 'उपेक्षा का स्मारक'?

बिलासपुर: सिस्टम से सवाल पूछने वाले ‘पत्रकार’ खुद सवालों के कटघरे में... बिरकोना की 'पत्रकार कॉलोनी' आखिर क्यों बन गई 'उपेक्षा का स्मारक'?

बिलासपुर । जो कलम दूसरों की खामियां गिनाती है, वह अपने ही घर की दुर्दशा पर खामोश क्यों है? यह सवाल बिलासपुर के बिरकोना में बसाई जा रही पत्रकार कॉलोनी  को देखकर हर उस शख्स के जहन में उठता है, जो पत्रकारिता को लोकतंत्र का सजग प्रहरी मानता है। यह कॉलोनी आज एक ऐसी विडंबना बन चुकी है, जिसकी हकीकत पर लिखते हुए खुद कलम को शर्मिंदगी महसूस हो। जिन लोगों का पेशा व्यवस्था की नाक में दम करना और भ्रष्ट सिस्टम को आईना दिखाना है, वे अपनी ही कॉलोनी की बदहाली पर ऐसे चुप्पी साधे बैठे हैं, जैसे सब कुछ “सेट” हो।

हाल ही में सीमांकन की प्रक्रिया शुरू होते ही अचानक जो सक्रियता दिखी है, वह हैरान करती है। ऐसा लगा जैसे बरसों की कुंभकर्णी नींद से कोई संस्था अचानक जाग उठी हो। लेकिन, यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—जब कॉलोनी खुद बदहाली के आंसू रो रही थी, तब यह तथाकथित जागरूकता कहां थी? क्या पत्रकारिता का ठेका सिर्फ दूसरों की कमियां निकालने तक सीमित है और जब अपनी बारी आए तो इसे “घर की बात” कहकर पर्दा डाल दिया जाए?

अधूरे सपनों की लाश और 'जुमले' का सच

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जमीनी हकीकत तो यह है कि यह कॉलोनी अब “विकास” का नहीं, बल्कि “उपेक्षा का स्मारक” बन चुकी है। डेढ़ सौ से ज्यादा प्लॉट बांट दिए गए, लेकिन नतीजा सिफर! मौके पर सिर्फ गिनती के मकान खड़े हैं और बाकी जमीन किसी अधूरे सपने की लाश की तरह वीरान पड़ी है। कभी जोर-शोर से शुरू हुआ “चलो घर बनाएं” अभियान आज एक ऐसा जुमला बन चुका है, जिस पर हंसी भी आती है और गुस्सा भी।

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सार्वजनिक मंचों पर पारदर्शिता और जवाबदेही की सबसे ऊंची आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार, अपनी ही समिति में बंद कमरों की राजनीति के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

300 भूमिहीन पत्रकारों का इंतजार और ‘सेटिंग’ का खेल

आज 300 से ज्यादा भूमिहीन पत्रकार अपनी जमीन का इंतजार कर रहे हैं—या यूं कहें कि उन्हें जानबूझकर “इंतजार करवाया जा रहा है।” बड़ा सवाल यह है कि सदस्यता का यह पूरा खेल किस आधार पर खेला गया? किसे फायदा पहुंचाया गया और किसे सलीके से किनारे कर दिया गया? इन सुलगते सवालों पर आखिर इतना सन्नाटा क्यों है? क्या यहां भी उसी “नेटवर्किंग” और “सेटिंग” का कॉकटेल चल रहा है, जिसके खिलाफ अखबारों के पन्ने रंगे जाते हैं?

कॉलोनी की डरावनी तस्वीर

 सड़कें नदारद : यहां सड़कें नहीं हैं, सिर्फ झूठे वादों की धूल उड़ रही है।

 सुरक्षा शून्य: सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं, इंसान नहीं बल्कि सांप और बिच्छू यहां के स्थायी मेहमान बन चुके हैं।

 गार्डन की जगह वीरानगी:  हरियाली और गार्डन की जगह सिर्फ खालीपन और झाड़ियां उग रही हैं।

विश्वसनीयता का दिवालियापन और टूटती खामोशी

इस खौफनाक सन्नाटे के बीच... पत्रकार साथियों की यह चुप्पी सबसे ज्यादा खतरनाक है। यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट की लापरवाही नहीं, बल्कि एक पेशे की विश्वसनीयता का दिवालियापन है। जब आप अपनी ही जमीन पर खुद को न्याय नहीं दिला पा रहे, तो समाज को न्याय दिलाने का दावा कितना खोखला है? अब भी वक्त है—या तो इस कॉलोनी को सच में बसाइए, या फिर खुलेआम स्वीकार कर लीजिए कि यह पूरा खेल सिर्फ जमीन बांटने तक सीमित था। क्योंकि कड़वा सच यही है कि यह कॉलोनी अब पत्रकारिता के आत्मसम्मान की खुली नीलामी का मंच बन चुकी है।

बिलासपुर प्रेस क्लब चुनाव के दौरान बेबाकी से अपनी बात रखने वाले कलमकार ने अब साफ कर दिया है कि खामोशी का दौर खत्म हुआ। कई साथियों का सवाल था कि 'लिखना क्यों बंद कर दिया?' उनका सीधा और स्पष्ट जवाब है— “रुका था, थका नहीं।”अब कलम फिर से चलेगी, और इस बार सीधा निशाना 'प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति' के वही दबे हुए मुद्दे होंगे। अब शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि जब सवाल उठेंगे, तो जवाब देने ही पड़ेंगे!

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