3.01 करोड़ का पुराना टेंडर निरस्त, नया जारी: पर फर्जीवाड़े के आरोपी ठेकेदार पर FIR नहीं ?

3.01 करोड़ का पुराना टेंडर निरस्त, नया जारी: पर फर्जीवाड़े के आरोपी ठेकेदार पर FIR नहीं ?

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही। जीपीएम जिले में जिला पंचायत भवन निर्माण के 3.01 करोड़ रुपये के विवादित टेंडर मामले में नया मोड़ आ गया है। भारी हंगामे और फर्जी दस्तावेजों के आरोपों के बीच विभाग ने पुराना टेंडर निरस्त कर दिया है और अब नए सिरे से टेंडर जारी किया गया है। लेकिन इस कार्रवाई ने सुधार कम और सवाल ज्यादा खड़े कर दिए हैं। चर्चा है कि जब टेंडर में फर्जीवाड़े के पुख्ता आरोप थे, तो विभाग ने आरोपी ठेकेदार हितेश सूर्यवानी पर एफआईआर दर्ज कराने के बजाय उसे चुपचाप 'क्लीन चिट' देने का रास्ता क्यों चुना?

कार्रवाई के नाम पर सिर्फ टेंडर कैंसिल, एफआईआर से परहेज

विभागीय सूत्रों के अनुसार, अनुभव और पूर्णता प्रमाण पत्र में गड़बड़ी की शिकायतें सही पाए जाने के डर से आनन-फानन में पुराने टेंडर को रद्द कर दिया गया। पेंड्रा थाने में शिकायत के बावजूद अब तक पुलिसिया कार्रवाई या विभाग की ओर से कोई कड़ी कानूनी पहल नहीं हुई है। ग्रामीण यांत्रिकी सेवा बिलासपुर के अधीक्षण अभियंता विनोद कुमार मिंज के नोटिस का जवाब देने के बजाय मरवाही के अधिकारियों ने टेंडर ही निरस्त कर दिया, जिससे भ्रष्टाचार के सबूतों को दबाने की आशंका जताई जा रही है।

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ठेकेदारों में नाराजगी: क्या ब्लैकलिस्ट होगा आरोपी ठेकेदार?

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जिले के ठेकेदारों का कहना है कि मरवाही में टेंडर समिति ने जिस तरह से सिंडिकेट बना कर खेल खेला, वह अब जगजाहिर है। ठेकेदारों ने सवाल उठाया है कि:

  •  अगर दस्तावेज फर्जी थे, तो ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट (काली सूची) में क्यों नहीं डाला गया?
     केवल टेंडर रद्द करना क्या विभाग की मिलीभगत को छिपाने की कोशिश है?
     क्या नए टेंडर में भी वही पुराना खेल दोहराया जाएगा जहां 24-25 प्रतिशत बिलो के बजाय सिर्फ 1-2 प्रतिशत बिलो रेट पर काम बांटा जाता है?

 मंत्री तक पहुंची फाइल

मरवाही के कार्यपालन अभियंता की लगातार चुप्पी ने इस पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है। विनोद कुमार मिंज ने तकनीकी जांच की बात कही थी, लेकिन जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने से पहले ही टेंडर की फाइल बंद कर दी गई। खबर है कि इस पूरे मामले की फाइल अब मंत्री स्तर तक पहुंच चुकी है और शिकायतकर्ता ने मांग की है कि टेंडर रद्द करना काफी नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आरोपी ठेकेदार और उसे संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर एफआईआर होनी चाहिए।

जांच के घेरे में मरवाही की टेंडर प्रणाली

3.01 करोड़ की इस भारी-भरकम परियोजना में हुए इस घटनाक्रम ने प्रशासन की पारदर्शिता की पोल खोल दी है। 

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