अखबार की सुर्खियों के बीच खो गई अखबार बांटने वाले की जिंदगी... बेटे की चिता ठंडी हो गई, लेकिन पुलिस अब भी सीमा नाप रही
बिलासपुर। 14 अप्रैल की वह सुबह शायद आम दिनों जैसी ही थी। आसमान में ठीक से उजाला भी नहीं हुआ था। 21 साल का विकास दास अपनी साइकिल पर अखबारों का भारी बंडल बांधकर घर से निकला था। पैडल मारते हुए वह शायद सोच रहा होगा कि इस महीने की पगार से घर की कुछ और जरूरतें पूरी कर लेगा। लेकिन उसे क्या पता था कि जिन अखबारों के जरिए वह दुनिया भर की खबरें लोगों के घरों तक पहुंचाता है, आज वह खुद एक दर्दनाक 'खबर' बनकर रह जाएगा।
नेशनल हाईवे-130 पर उस मनहूस सुबह एक तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने काल बनकर विकास को जोरदार टक्कर मार दी। सड़क पर खून से लथपथ विकास, टूटी हुई साइकिल और हवा में उड़ते हुए अखबार के पन्ने... यह नजारा सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि एक गरीब परिवार के सपनों का चकनाचूर होना था। अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उस मासूम ने दम तोड़ दिया।
सिस्टम का क्रूर चेहरा: थानों के बीच 'फुटबॉल' बना परिवार
विकास तो इस जालिम दुनिया को छोड़कर चला गया, लेकिन उसके पीछे छूट गया उसका बेबस परिवार, जो अब अपने ही सिस्टम से हार रहा है। हादसे को आठ दिन बीत चुके हैं, बेटे की चिता की आग ठंडी हो चुकी है, लेकिन न्याय की फाइल अब तक नहीं खुली। आठ दिन बाद भी पुलिस एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं कर सकी है। बिलासपुर पुलिस हत्यारे को ढूंढने के बजाय 'सीमा विवाद' का खेल खेल रही है।
पहले कोनी थाना और फिर रतनपुर थाना... गम में डूबे परिजनों को पुलिस थानों के बीच फुटबॉल बना दिया गया। हद तो तब हो गई जब रोते-बिलखते और बदहवास परिजनों को खुद घटनास्थल की तस्वीरें और लोकेशन पुलिस के सामने पेश करनी पड़ी, ताकि वे यह साबित कर सकें कि उनके बेटे का खून किस थाने की सरहद में बहा है। पुलिस बस 'केस डायरी' का हवाला देकर कार्रवाई टाल रही है। वक्त बीत रहा है और इसके साथ ही फरार आरोपी के खिलाफ बचे-खुचे सबूत भी धुंधले पड़ते जा रहे हैं।
एक गरीब की मौत: जहां टूट गए पिता के कंधे
रतनपुर थाना क्षेत्र के ग्राम मोहतराई का रहने वाला विकास तीन भाइयों में सबसे बड़ा था। पिता के कमजोर होते कंधों को आराम देने के लिए उसने महज छह महीने पहले ही अखबार बांटने का यह मेहनत भरा काम शुरू किया था। वह परिवार का उभरता हुआ सहारा था। आज उस घर के आंगन में खौफनाक सन्नाटा पसरा है। मां की आंखों से आंसू सूख चुके हैं और पिता की कमर जैसे पूरी तरह टूट गई है।
आर्थिक तंगी और मानसिक संताप से जूझ रहे इस परिवार के पास अब बस एक ही सवाल है- क्या इस देश में न्याय सिर्फ रसूखदारों के लिए है? क्या एक गरीब, अखबार बांटने वाले युवक की जान की कोई कीमत नहीं? सड़क पर दौड़ते उस कातिल वाहन का ड्राइवर आज आजाद घूम रहा है और एक लाचार परिवार सिस्टम की चौखट पर न्याय की भीख मांग रहा है।
