छत्तीसगढ़ में फिर शराब सिंडिकेट की आहट! MP में ब्लैकलिस्ट 'सोम डिस्टिलरीज' की बैकडोर एंट्री, बवाल मचने पर AG की शरण में आबकारी विभाग

छत्तीसगढ़ में फिर शराब सिंडिकेट की आहट! MP में ब्लैकलिस्ट 'सोम डिस्टिलरीज' की बैकडोर एंट्री, बवाल मचने पर AG की शरण में आबकारी विभाग

रायपुर (NJV News). छत्तीसगढ़ और शराब विवादों का जैसे चोली-दामन का साथ हो गया है। राज्य में एक तरफ जहां 2100 करोड़ रुपये के बहुचर्चित शराब घोटाले की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई है और प्रवर्तन निदेशालय (ED) 50 से अधिक आबकारी अफसरों से पूछताछ कर रही है, वहीं आबकारी विभाग की एक नई 'चूक' ने मंत्रालय के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

मामला मध्य प्रदेश में फर्जी परमिट और अवैध शराब परिवहन के आरोप में ब्लैकलिस्ट की गई 'सोम डिस्टिलरीज एंड ब्रुवरीज लिमिटेड' की छत्तीसगढ़ में बैकडोर एंट्री से जुड़ा है। 2026-27 की नई प्राइस लिस्ट में इस दागी कंपनी का नाम शामिल होने से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह महज टेंडर प्रक्रिया की कोई तकनीकी खामी है या फिर प्रदेश में एक नए सिंडिकेट ने जड़ें जमाना शुरू कर दिया है?

लूपहोल से एंट्री या सिस्टम की मेहरबानी?

दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश है। 4 फरवरी 2026 को एमपी आबकारी विभाग ने कड़ा रुख अपनाते हुए सोम डिस्टिलरीज का लाइसेंस निलंबित कर दिया था। कंपनी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 23 मार्च 2026 को अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि शराब बेचना कोई मौलिक अधिकार नहीं है और राज्य की कार्रवाई पूरी तरह वैध है।

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नियमों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में सप्लायर बनने के लिए कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड और लाइसेंस वैध होना चाहिए। लेकिन सूत्रों की मानें तो, जब एमपी में कंपनी का मुख्य लाइसेंस फंसा, तो छत्तीसगढ़ में एंट्री के लिए 'ओडिशा यूनिट' और कुछ सहयोगी फर्मों को मुखौटा बनाकर आगे कर दिया गया। विभागीय स्क्रूटनी कमेटी क्या इतनी कमज़ोर थी कि वह इस पुराने 'सिंडिकेट फॉर्मूले' को पकड़ नहीं पाई?

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डैमेज कंट्रोल में जुटा आबकारी महकमा

अब जब इस 'बैकडोर एंट्री' का भंडाफोड़ हुआ है, तो आबकारी विभाग में डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू हो गई है। विभाग का बचाव है कि जब सप्लायर्स के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की गई थी, तब कंपनी के रिकॉर्ड पर कोई दाग नहीं था।

आबकारी सचिव आर. संगीता ने स्पष्ट किया है कि टेंडर के वक्त कंपनी सभी शर्तों को पूरा कर रही थी। लेकिन मार्च में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद स्थितियां बदल गई हैं। अब खुद को किसी भी नए विवाद से बचाने और सुरक्षित रास्ता निकालने के लिए विभाग ने महाधिवक्ता (AG) को पत्र लिखकर विधिक राय मांगी है। यानी फिलहाल गेंद अब कानूनी सलाहकारों के पाले में डाल दी गई है।

पुराने घोटाले का प्रेत और नए सवाल

छत्तीसगढ़ के लिए शराब में 'सिंडिकेट' शब्द कोई नया नहीं है। 2019 से 2022 के बीच हुए घोटाले ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं:

 अनअकाउंटेड शराब का खेल: बिना रिकॉर्ड के सरकारी दुकानों में शराब बेची गई और नकली होलोग्राम का इस्तेमाल कर सीधा सरकारी खजाने को करोड़ों की चपत लगाई गई।

 वीआईपी गिरफ्तारियां:इस मामले में पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, अनवर ढेबर और तत्कालीन आबकारी मंत्री कवासी लखमा तक जांच की आंच पहुंची।

 कमीशनखोरी का फिक्स रेट: ईडी की जांच में साबित हुआ था कि प्रति पेटी सप्लायरों से फिक्स कमीशन लिया जाता था, जिससे 2800 करोड़ से ज्यादा का अवैध राजस्व बटोरा गया।

सुशासन के दावों के बीच सुलगते सवाल

नई सरकार पुराने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा कर रही है, लेकिन नाक के नीचे दागी कंपनी का टेंडर पास हो जाना इंटेलिजेंस पर सवाल खड़े करता है। क्या टेंडर पास करने वाली टेक्निकल कमेटी ने ओडिशा यूनिट के पीछे छुपे 'मूल चेहरे' की जांच करने की जहमत नहीं उठाई? क्या छत्तीसगढ़ के स्थानीय और बेदाग सप्लायर्स को दरकिनार कर किसी खास को फायदा पहुंचाया जा रहा है?

महाधिवक्ता की राय चाहे जो भी हो, लेकिन 'सोम' की इस एंट्री ने यह साबित कर दिया है कि सिस्टम के लूपहोल्स का फायदा उठाने वाले खिलाड़ी आज भी उतने ही सक्रिय हैं। देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस दागी कंपनी पर कैंची चलाती है या सिस्टम फिर से नतमस्त

क हो जाता है।

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