बलौदा की सांसों पर संकट: हवा में 12 गुना ज्यादा जहर, फिर भी कोल वॉशरी विस्तार की तैयारी, कागजों में ऑल इज वेल,हकीकत में घुट रहा दम

बलौदा की सांसों पर संकट: हवा में 12 गुना ज्यादा जहर, फिर भी कोल वॉशरी विस्तार की तैयारी, कागजों में ऑल इज वेल,हकीकत में घुट रहा दम

बलौदा । क्या विकास की कीमत आम आदमी को अपनी सांसें गिरवी रखकर चुकानी होगी? बलौदा क्षेत्र में यह सवाल अब सुलगने लगा है। एक तरफ यहां की हवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय मानकों से लगभग 12 गुना अधिक जहर (PM 2.5) घुल चुका है, तो दूसरी तरफ प्रशासन हिन्दू मल्टी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की कोल वॉशरी क्षमता को कई गुना बढ़ाने के लिए जनसुनवाई का मंच सजा रहा है।कंपनी का प्रस्ताव अपनी कोल वॉशरी की क्षमता को 0.96 एमटीपीए से बढ़ाकर 2.4 एमटीपीए करने और 25 मेगावाट का नया एएफबीसी (AFBC) पावर प्लांट लगाने का है। इस विस्तार को हरी झंडी दिलाने के लिए जो पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट पेश की गई है, वह जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आ रही है।

कागजों का खेल बनाम जमीनी हकीकत

 कंपनी की रिपोर्ट कहती है कि इलाके की आबोहवा राष्ट्रीय मानकों के भीतर है। इसमें PM2.5 का स्तर 28.8 से 42.5 और PM10 का स्तर 48 से 70.8 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर बताया गया है।

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 हालिया रीयल टाइम मॉनिटरिंग में बलौदा का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 155 (अनहेल्दी श्रेणी) दर्ज हुआ। इस दौरान PM2.5 का स्तर 62.2 और PM10 का स्तर 105.1 तक पहुंच गया।

WHO के अनुसार, हवा में PM2.5 की सुरक्षित वार्षिक सीमा मात्र 5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। बलौदा में यह स्तर 12 गुना से भी ज्यादा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब यहां का पर्यावरण पहले से ही वेंटिलेटर पर है, तो एक और भारी-भरकम औद्योगिक विस्तार का बोझ यह इलाका कैसे सहेगा?

जनता का सवाल- क्या मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

स्थानीय रहवासियों का कहना है कि उन्हें विकास और उद्योगों से परहेज नहीं है, लेकिन मुनाफे की आड़ में नागरिकों से स्वच्छ हवा का अधिकार नहीं छीना जा सकता। लोगों ने प्रशासन और पर्यावरण विभाग से सीधा सवाल किया है— यदि इस विस्तार के बाद प्रदूषण का स्तर जानलेवा हो गया, तो क्या प्रशासन इन उद्योगों पर ताला जड़ने की हिम्मत दिखाएगा? या फिर जनता को इसी जहरीली हवा में तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

जनसुनवाई से पहले उठ रही प्रमुख मांगें

नए विस्तार की मंजूरी से पहले बलौदा क्षेत्र की वास्तविक 'प्रदूषण वहन क्षमता' (Carrying Capacity) की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए। सिर्फ इस प्रोजेक्ट का नहीं, बल्कि आसपास के सभी उद्योगों, भारी वाहनों से उड़ने वाली धूल और कोयला परिवहन से होने वाले कुल प्रदूषण का आंकड़ा जनता के सामने रखा जाए।

अब सबकी निगाहें आगामी जनसुनवाई पर टिक गई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि जब जनता के तीखे सवालों और रियल टाइम प्रदूषण के आंकड़ों का सामना होगा, तो कंपनी के पर्यावरण सलाहकार और सरकारी अफसर किस तरह से अपनी ग्रीन रिपोर्ट का बचाव करते हैं। यह लड़ाई अब सिर्फ एक उद्योग के विरोध की नहीं, बल्कि बलौदा की पीढ़ियों के जिंदा रहने की है।

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