तकनीकी विवि में पीएचडी वाले जालसाज: साढ़े 9 लाख की फीस डकारने वाले कनिष्ठ सलाहकार पर एफआईआर

तकनीकी विवि में पीएचडी वाले जालसाज: साढ़े 9 लाख की फीस डकारने वाले कनिष्ठ सलाहकार पर एफआईआर

भिलाई के छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (सीसवीटीयू) में पीएचडी कर रहे छात्रों के साथ बड़ी धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। विवि प्रशासन की शिकायत पर नेवई पुलिस ने पीएचडी शाखा में तैनात कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ गबन और जालसाजी का केस दर्ज किया है। आरोप है कि सुनील ने छात्रों से फीस के नाम पर साढ़े नौ लाख रुपए वसूले और उन्हें फर्जी रसीदें थमा दीं। इस खेल का खुलासा तब हुआ जब दो सदस्यीय जांच समिति ने फाइलें खंगालीं और पाया कि सरकारी खजाने में पैसा पहुंचा ही नहीं है।

साहब के खाते में जा रही थी छात्रों की फीस

जांच में यह बात सामने आई है कि आरोपी सुनील प्रसाद पीएचडी के छात्रों से फीस की रकम कैश ले लेता था। कुछ छात्रों से उसने अपने पर्सनल बैंक खाते में ऑनलाइन पैसे भी ट्रांसफर कराए। इसके बदले छात्रों को विश्वविद्यालय की फर्जी रसीदें दे दी गईं ताकि उन्हें शक न हो। जब मामला गरमाया तो आरोपी ने अपना बचाव करने के लिए नया पैंतरा चला। उसने जांच समिति को बताया कि वह यह सारा पैसा तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव अंकित अरोरा को दे देता था। हालांकि जब सबूत मांगे गए तो वह एक भी कागज पेश नहीं कर सका।

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छात्रों की मेहनत की कमाई पर डाका

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इस गबन ने उन शोधार्थियों को तोड़कर रख दिया है जो दिन-रात मेहनत कर अपनी पीएचडी पूरी करने में जुटे हैं। छात्रों का कहना है कि उन्होंने पेट काटकर फीस जमा की थी ताकि डिग्री मिल सके, लेकिन उन्हें क्या पता था कि विवि के भीतर ही ठग बैठे हैं। नेवई पुलिस के निरीक्षक अनिल साहू ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच की जा रही है। पुलिस को शक है कि साढ़े नौ लाख का यह आंकड़ा सिर्फ शुरुआत है और जांच आगे बढ़ी तो विवि के कुछ और बड़े साहब इस लपेटे में आ सकते हैं।

प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि बिना बड़े अधिकारियों के वरदहस्त के एक कनिष्ठ सलाहकार इतना बड़ा गबन अकेले नहीं कर सकता। फिलहाल आरोपी फरार बताया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि विवेचना के दौरान अगर किसी और कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत के सबूत मिले तो उन पर भी कड़ी वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

 

डिस्क्लेमर: यह समाचार रिपोर्टिंग पुलिस में दर्ज एफआईआर और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी शुरुआती जांच रिपोर्ट पर आधारित है।

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