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धर्मांतरण विरोधी कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: केंद्र सहित 12 राज्यों को नोटिस, वैधता पर उठे सवाल
नई दिल्ली। देश के विभिन्न राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम संवैधानिक चुनौती सामने आई है। चर्चों की राष्ट्रीय परिषद (नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेस) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार समेत 12 राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिका में संबंधित राज्यों द्वारा बनाए गए धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता संस्था का तर्क है कि ये कानून संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। साथ ही, याचिका में इन कानूनों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की गई है।
धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रभाव का दावा
याचिका में कहा गया है कि धर्मांतरण विरोधी कानूनों के चलते अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाई संस्थाओं और चर्च से जुड़े व्यक्तियों को अनावश्यक उत्पीड़न और कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। संस्था का आरोप है कि इन कानूनों का दुरुपयोग कर धार्मिक गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में लाया जा रहा है।
शीर्ष अदालत की पीठ ने मांगा जवाब
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और संबंधित 12 राज्यों से विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही आगे की कार्यवाही तय की जाएगी।
अगली सुनवाई जल्द
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि मामले की अगली सुनवाई की तारीख शीघ्र निर्धारित की जाएगी। इस याचिका को देश में धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य कानूनों की वैधता और संविधान के अनुच्छेद 25 से जुड़े अधिकारों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मामला माना जा रहा है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
