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योग्यता नहीं तो नियुक्ति नहीं: 14 साल बाद भी राहत नहीं, हाईकोर्ट ने 67 अपात्र सब-इंजीनियरों को हटाया
रायपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की वर्ष 2011 की सब-इंजीनियर (सिविल) भर्ती में हुई गंभीर अनियमितताओं पर कड़ा रुख अपनाते हुए 67 उप अभियंताओं की नियुक्तियों को अवैध घोषित कर निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि निर्धारित कट-ऑफ तिथि तक आवश्यक शैक्षणिक योग्यता न रखने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) मानी जाएगी। यह महत्वपूर्ण फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रवि तिवारी द्वारा दायर रिट अपील पर सुनाया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शाल्विक तिवारी ने पक्ष रखा।
2011 की भर्ती प्रक्रिया की हुई विस्तृत न्यायिक समीक्षा
हाई कोर्ट ने वर्ष 2011 में घोषित 275 सब-इंजीनियर पदों की भर्ती प्रक्रिया की वैधता की गहन समीक्षा की। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि विज्ञापन की शर्तों के अनुसार 23 मार्च 2011 तक अभ्यर्थियों के पास संबंधित डिग्री या डिप्लोमा होना अनिवार्य था, इसके बावजूद विभाग ने कई ऐसे उम्मीदवारों को नियुक्त कर दिया जिन्होंने यह योग्यता कट-ऑफ तिथि के बाद हासिल की थी।
जांच रिपोर्ट में अपात्र, फिर भी बनी रही नौकरी
मामले में यह भी उजागर हुआ कि जांच समितियों की रिपोर्ट में 89 अभ्यर्थियों को अपात्र घोषित किया गया था, इसके बावजूद विभाग ने उन्हें सेवा में बनाए रखा। हाई कोर्ट ने इसे नियमों का खुला उल्लंघन मानते हुए नियुक्तियों को असंवैधानिक करार दिया।
भर्ती प्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
इस फैसले ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की 2011 की भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही, इसे सरकारी नौकरियों में नियमों के सख्त पालन और योग्यता आधारित चयन सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम और दूरगामी निर्णय माना जा रहा है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
