मैनपाट का मुआवजा घोटाला : खेत काग़ज़ों में, ज़मीन खदान में और भुगतान रेस्ट हाउस के नाम!

मैनपाट का मुआवजा घोटाला : खेत काग़ज़ों में, ज़मीन खदान में और भुगतान रेस्ट हाउस के नाम!

मैनपाट। सरगुजा जिले के मैनपाट में बॉक्साइट खनन के नाम पर मुआवजे की ऐसी रेवड़ियां बांटी जा रही हैं कि जिसे सुनकर किसी का भी सिर चकरा जाए। प्रशासन ने उन लोगों के नाम पर भी लाखों-करोड़ों की रकम लिख दी है जिनका गांव से कोई नाता ही नहीं है और जहां आलीशान रेस्ट हाउस खड़े हैं कागजों में वहां फसल बर्बाद होने का मुआवजा दिया जा रहा है। उरंगा और बरिमा गांव में छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की खदान के लिए करीब 19 करोड़ रुपये का यह फर्जीवाड़ा सामने आया है।

प्रशासन की मेहरबानी का आलम यह है कि चर्चित सीजीपीएससी घोटाले के आरोपी टामन सिंह सोनवानी के बेटे अभिषेक सोनवानी को भी 25 लाख रुपये देने की तैयारी है। मजेदार बात यह है कि जिस जमीन के लिए फसल क्षति का पैसा दिया जा रहा है वहां कोई खेत नहीं बल्कि एक शानदार रेस्ट हाउस बना हुआ है। यानी सरकारी कागजों में अब कंक्रीट की दीवारों पर भी फसलें लहलहा रही हैं और अफसर इसे सच मानकर फाइलें आगे बढ़ा रहे हैं।

बरिमा गांव में तो चमत्कार ही हो गया है। यहां रहने वाले रमजान के पास कुल जमा डेढ़ एकड़ जमीन है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसे 23 एकड़ का मालिक बताकर एक करोड़ रुपये का मुआवजा तय कर दिया गया। बेचारा रमजान अपनी मिट्टी की झोपड़ी में बैठकर इस बात से हैरान है कि वह रातों-रात करोड़पति कैसे बन गया। वहीं उरंगा गांव में 23 ऐसे लोग लिस्ट में शामिल हैं जो अंबिकापुर में रहते हैं और गांव में उनकी एक इंच जमीन भी नहीं है। कुछ प्रभावशाली नेताओं के करीबियों को उपकृत करने के लिए यह पूरा मायाजाल बुना गया है।

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गांव के दिनेश्वर सोनी जैसे कई लोगों का कहना है कि उन्होंने मुआवजा मांगा ही नहीं और न ही उन्हें इसकी खबर है। उनका कहना है कि वहां उनकी खेती नहीं बल्कि कॉटेज है। इस पूरे खेल में दलालों और अफसरों की जुगलबंदी साफ नजर आ रही है। विरोध कम हो इसके लिए असली प्रभावितों को छोड़कर बाहरी लोगों को पैसा बांटा जा रहा है। मैनपाट तहसीलदार ममता रात्रे ने बताया कि मुआवजा भुइयां रिकॉर्ड और पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर तय हुआ है और फाइल आगे भेजी गई है। उन्होंने कहा कि शिकायत मिलने पर जांच की जाएगी। हालांकि सवाल यह है कि जब मौके पर जमीन और मालिक का अता-पता ही नहीं था तो तहसीलदार और एसडीएम ने इन फाइलों पर मुहर कैसे लगा दी।

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