उद्योगों में मौत का खेल: मुनाफे की हवस में मजदूरों की बलि; 3 साल में 296 मौतें, हादसों के बाद लाशें और मामले छिपाने में जुटता है प्रबंधन

उद्योगों में मौत का खेल: मुनाफे की हवस में मजदूरों की बलि; 3 साल में 296 मौतें, हादसों के बाद लाशें और मामले छिपाने में जुटता है प्रबंधन

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र अब मजदूरों के लिए मौत का कुआं बनते जा रहे हैं। बिलासपुर समेत पूरे प्रदेश के उद्योगों में सुरक्षा के दावे पूरी तरह फेल हो चुके हैं। फैक्ट्री मालिकों को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब है। चंद रुपयों का फायदा कमाने के लिए मजदूरों की सुरक्षा को पूरी तरह से कुचल दिया गया है। हालात इतने भयानक हैं कि प्रदेश में हर महीने औसतन 8 से 10 मजदूर औद्योगिक हादसों का शिकार होकर जान गंवा रहे हैं।

सिस्टम का हाल यह है कि हर बड़े हादसे के बाद अफसर एसी कमरों में बैठकर 'जीरो टॉलरेंस' और सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है। हेलमेट, ग्लव्स, फायर सेफ्टी और मॉनिटरिंग सिस्टम सिर्फ कागजों और फाइलों तक सीमित हैं।

आंकड़े दे रहे गवाही, कितनी भयानक है सच्चाई

विधानसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़े खुद सिस्टम की पोल खोल रहे हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या किसी एक फैक्ट्री की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में ही दीमक लग चुका है।

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  •   296 मौतें: पिछले 3 सालों में प्रदेश के उद्योगों में 296 मजदूरों की दर्दनाक मौत हो चुकी है।
  •  248 घायल: इन्ही तीन सालों में 248 मजदूर गंभीर रूप से घायल और अपाहिज हुए हैं।
  •  खतरनाक फैक्ट्रियां: प्रदेश में 7300 से ज्यादा फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिनमें से करीब 1000 'खतरनाक' (Hazardous) श्रेणी में आती हैं।
  •  मौत के सेक्टर: सबसे ज्यादा हादसे स्टील, स्पंज आयरन और पावर प्लांट में हो रहे हैं।
हादसे से ज्यादा खतरनाक है प्रबंधन की नीयत

फैक्ट्रियों में जब भी कोई ब्लास्ट होता है या आग लगती है, तो प्रबंधन का पहला फोकस मजदूरों की जान बचाना नहीं, बल्कि मामले को दबाना होता है। घायलों को गुपचुप तरीके से निजी अस्पतालों में भर्ती कराया जाता है। पुलिस और दमकल विभाग को भी तब खबर दी जाती है, जब हालात बेकाबू हो जाते हैं। मित्तल फर्नीचर से लेकर फिल स्टील तक, हर हादसे में यही पैटर्न देखने को मिला है।

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बिलासपुर में हादसों की एक जैसी 'स्क्रिप्ट'

बीते कुछ महीनों में बिलासपुर में हुए हादसों पर नजर डालें, तो जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती दिखती है:

 23 दिसंबर (मित्तल फर्नीचर, सिरगिट्टी): 10 हजार लीटर ज्वलनशील पदार्थ के बीच मजदूर काम कर रहे थे। आग लगी और दो मजदूरों की जिंदा जलकर मौत हो गई। आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, सिर्फ 'जांच जारी है'।
 16 फरवरी (अनव इंडस्ट्रीज, तिफरा): भीषण आग लगी, एक महिला चपेट में आई। इतनी बड़ी फैक्ट्री में आग बुझाने के लिए सिर्फ 3 छोटे सिलेंडर थे। यहां भी 'जांच जारी है'।
 10 मार्च (नोवा प्लांट, बिल्हा): पिघला हुआ लोहा (आयरन) उछलने से 4 मजदूर बुरी तरह झुलस गए। नतीजा- 'जांच जारी है'।
 28 मार्च (फिल स्टील एंड पावर, घुटकू): इंडक्शन फर्नेस/बॉयलर फटने से क्रेन ऑपरेटर बुरी तरह झुलस गया। घंटों तक पुलिस को भनक तक नहीं लगने दी गई।
 
मुआवजे की आड़ में बच निकलते हैं जिम्मेदार

 

विश्लेषकों का मानना है कि हादसों के बाद फैक्ट्री मालिक मृतक के परिवार को कुछ लाख रुपये का मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। इंडस्ट्रियल हेल्थ एंड सेफ्टी विभाग और पुलिस सिर्फ कागजी खानापूर्ति करते हैं। जब तक दोषी अधिकारियों और फैक्ट्री मालिकों पर एफआईआर (FIR) दर्ज कर उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा और फैक्ट्रियों के लाइसेंस रद्द नहीं होंगे, तब तक ये मौतें नहीं रुकेंगी। अचानक निरीक्षण (Surprise Inspection) पूरी तरह से बंद हो चुके हैं।

कांग्रेस का अल्टीमेटम: जीरो टॉलरेंस लागू हो

लगातार हो रही मौतों पर अब सियासत भी गरमा गई है। कांग्रेस के शहर अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा ने इसे प्रशासन और प्रबंधन की मिलीभगत बताया है। उन्होंने कहा कि मजदूरों की जान की कीमत सिर्फ मुआवजा नहीं हो सकती। जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। अगर जल्द एक्शन नहीं लिया गया, तो कांग्रेस सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेगी।

 

अफसरों का रटा-रटाया जवाब

औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर विजय सोनी का कहना है कि लापरवाही बरतने वाले उद्योगों पर कार्रवाई की जा रही है। केवल डंडे के जोर पर हादसे नहीं रुकेंगे, इसके लिए जागरूकता और नियमित मॉनिटरिंग जरूरी है। प्रबंधन को सुरक्षा मानकों (SOP) को प्राथमिकता बनानी होगी।

 

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