बिलासपुर: प्रेस क्लब की जमीन नपाई पर 'गृह निर्माण समिति' में खलबली क्यों? बिना 'बंदरबांट' सीमांकन से डर कैसा... खुल रहे 2022 के गड़े मुर्दे!

बिलासपुर: प्रेस क्लब की जमीन नपाई पर 'गृह निर्माण समिति' में खलबली क्यों? बिना 'बंदरबांट' सीमांकन से डर कैसा... खुल रहे 2022 के गड़े मुर्दे!

बिलासपुर।शहर में पत्रकारों की दो संस्थाओं के बीच जमीन को लेकर सुलग रही चिंगारी अब धधकती हुई सतह पर आ गई है। बिलासपुर प्रेस क्लब और प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति के बीच सीधा टकराव शुरू हो गया है। विवाद का केंद्र है— जमीन का सीमांकन। प्रेस क्लब की पहल पर प्रशासन ने जमीन नपाई (सीमांकन) का आदेश क्या निकाला, गृह निर्माण समिति के खेमे में भूचाल आ गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर जमीन के आवंटन में कोई 'बंदरबांट' या 'खेल' नहीं हुआ है, तो फिर एक सामान्य सी सरकारी नपाई से इतनी घबराहट क्यों है?

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क्या है पूरा मामला और आपत्ति की वजह?

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हाल ही में बिलासपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अजीत मिश्रा के आवेदन पर तहसीलदार कोर्ट से बिलासपुर प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति की भूमि के सीमांकन का आदेश जारी हुआ। जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, गृह निर्माण समिति के अध्यक्ष संजीव पाण्डेय ने तहसीलदार को एक तीखी आपत्ति सौंप दी।

पाण्डेय का तर्क है कि प्रेस क्लब और गृह निर्माण समिति दोनों अलग-अलग विधिक संस्थाएं हैं। उनका कहना है कि अजीत मिश्रा न तो समिति के सदस्य हैं और न ही पदाधिकारी, इसलिए उन्हें समिति की संपत्ति के सीमांकन का आवेदन लगाने का कोई अधिकार नहीं है। संजीव पाण्डेय ने यहां तक चेतावनी दे डाली है कि अगर बिना उनका पक्ष सुने एकतरफा जारी किया गया यह सीमांकन आदेश निरस्त नहीं हुआ, तो वे प्रशासन के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।

तीखा सवाल: नपाई से परहेज क्यों? शंका के घेरे में समिति

गृह निर्माण समिति के अध्यक्ष के इस आक्रामक कदम ने पूरे मामले को शंका के गहरे बादलों से घेर दिया है। शहर के प्रबुद्ध वर्ग और खुद पत्रकार बिरादरी में यह सवाल तैर रहा है कि आखिर सीमांकन से परहेज क्यों?

तकनीकी रूप से देखें तो गृह निर्माण समिति का जन्म ही प्रेस क्लब के गर्भ से हुआ है। समिति की उपविधियों में भी यह स्पष्ट है कि इसका सदस्य बनने के लिए प्रेस क्लब का सदस्य होना अनिवार्य है। ऐसे में 'मातृ संस्था' के अध्यक्ष द्वारा जमीन की स्थिति स्पष्ट करने के लिए सीमांकन की पहल करने पर गृह निर्माण समिति को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? कोई भी साफ-सुथरी संस्था अपनी संपत्ति की नपाई का स्वागत करती है, ताकि विवाद खत्म हों। लेकिन यहां सीमांकन रुकवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है, जो इस बात का संकेत दे रहा है कि जमीन के भीतर कोई बड़ा 'राज' दफ्न है, जिसके बाहर आने का खौफ है।

 

2022 के गड़े मुर्दे: जब लटकी थी FIR की तलवार

 

गृह निर्माण समिति के कामकाज पर उठ रहे ये सवाल हवा-हवाई नहीं हैं, बल्कि इनका एक पुख्ता अतीत है। इस नए विवाद ने 2022 के उस काले अध्याय को फिर से जिंदा कर दिया है, जब समिति पर गंभीर आरोप लगे थे।

गौरतलब है कि 27 सितंबर 2022 को उप पंजीयक (सहकारी संस्थाएं, बिलासपुर) ने वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक को पत्र लिखा था। जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ था कि प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति के पूर्व अध्यक्ष और तत्कालीन संचालक मंडल ने विभागीय कार्यालय और जांच दल को समिति से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज और अभिलेख उपलब्ध ही नहीं कराए थे।

रिकॉर्ड छिपाने की इस गंभीर प्रवृत्ति को देखते हुए तब के जांच प्रतिवेदन में समिति के जिम्मेदारों के खिलाफ छत्तीसगढ़ सहकारी सोसायटी अधिनियम 1960 के तहत एफआईआर (FIR) तक की अनुशंसा की गई थी।

 

क्या फिर छिपाये जा रहे हैं तथ्य?*

 

2022 में दस्तावेजों को जांच दल से छिपाना और 2026 में जमीन के सीमांकन (नपाई) का पुरजोर विरोध करना— इन दोनों घटनाओं को अगर जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर बेहद धुंधली और संदेहपूर्ण नजर आती है।

अब देखना यह दिलचस्प होगा कि बिलासपुर जिला प्रशासन और तहसीलदार इस दबाव के आगे झुककर सीमांकन आदेश निरस्त करते हैं, या फिर पारदर्शी तरीके से जमीन की नपाई करवाकर दूध का दूध और पानी का पानी करते हैं। फिलहाल, सीमांकन के इस खौफ ने 'गृह निर्माण समिति' की कार्यप्रणाली को एक बार फिर सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।

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