प्रभारी DGP पर तकरार: UPSC ने मुख्य सचिव से मांगा जवाब; पूछा- एक साल से स्थायी नियुक्ति क्यों नहीं?

प्रभारी DGP पर तकरार: UPSC ने मुख्य सचिव से मांगा जवाब; पूछा- एक साल से स्थायी नियुक्ति क्यों नहीं?

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग के सबसे बड़े पद (DGP) पर स्थायी नियुक्ति न होने को लेकर दिल्ली से रायपुर तक हलचल तेज हो गई है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने राज्य के मुख्य सचिव विकासशील को कड़ा पत्र भेजकर स्पष्टीकरण मांगा है। आयोग ने पूछा है कि राज्य में पिछले एक साल से 'प्रभारी' DGP के भरोसे काम क्यों चलाया जा रहा है और अब तक पूर्णकालिक नियुक्ति क्यों नहीं की गई?

UPSC के अवर सचिव दीपक शॉ की ओर से जारी इस पत्र में सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों का हवाला दिया गया है। आयोग ने नाराजगी जताई है कि 13 मई 2025 को ही तीन सीनियर आईपीएस अफसरों का पैनल भेजने के बावजूद सरकार ने अब तक किसी एक नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगाई। नियम के मुताबिक, पैनल मिलने के बाद सरकार को तत्काल स्थायी DGP की अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जारी करनी थी, जो अब तक आयोग को नहीं मिली है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की याद दिलाई

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आयोग ने मुख्य सचिव से पूछा है कि 3 जुलाई 2018 को 'प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था, उसका पालन छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं हो रहा? अदालत ने साफ कहा था कि किसी भी राज्य में 'कार्यवाहक' या 'प्रभारी' DGP की परंपरा नहीं चलेगी। छत्तीसगढ़ में पिछले साल फरवरी से 1992 बैच के आईपीएस अरुण देव गौतम प्रभारी DGP के तौर पर कमान संभाल रहे हैं। आयोग ने अब सरकार से देरी का 'ठोस कारण' पूछा है।

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पैनल में ये तीन नाम हैं शामिल

पिछले साल UPSC की बैठक के बाद राज्य सरकार को तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजा गया था:

  •  अरुण देव गौतम (1992 बैच) - वर्तमान में प्रभारी DGP
  •   पवन देव (1992 बैच)
  •  हिमांशु गुप्ता (1994 बैच)

 एनालिसिस: आखिर क्यों अटकी है स्थायी DGP की नियुक्ति?

प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि स्थायी नियुक्ति न होने के पीछे कई पेच फंसे हुए हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट और सूत्रों के विश्लेषण से ये तीन मुख्य कारण सामने आते हैं:

 वरिष्ठता का पेंच: 1992 बैच में दो बड़े दावेदार हैं—अरुण देव गौतम और पवन देव। सरकार किसी एक को चुनकर दूसरे को नाराज करने के जोखिम से बच रही है। वहीं 1994 बैच के हिमांशु गुप्ता भी दौड़ में शामिल हैं। वरिष्ठता और आपसी तालमेल के चक्कर में फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही है।

 पसंदीदा अफसर की तलाश: चर्चा है कि शासन अपनी कार्यप्रणाली में पूरी तरह फिट बैठने वाले अधिकारी को ही लंबी पारी देना चाहता है। पैनल में शामिल नामों के अलावा भी अन्य विकल्पों और भविष्य की नियुक्तियों पर अनौपचारिक विचार-विमर्श चलता रहा, जिससे समय निकलता गया।

 प्रशासनिक सुस्ती और टालमटोल: चूंकि प्रभारी व्यवस्था से काम सुचारू रूप से चल रहा था, इसलिए सरकार ने इसे प्राथमिकता पर नहीं लिया। लेकिन अब UPSC के तीखे पत्र और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के डर से सरकार को जल्द ही फैसला लेना होगा।

UPSC के इस रुख के बाद अब मंत्रालय में हलचल बढ़ गई है। माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही तीनों में से किसी एक नाम पर मुहर लगाकर आयोग को जवाब भेजेगी।

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