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CG vs CBSE संबद्धता विवाद: बिलासपुर में फर्जी स्कूलों पर शिकंजा, 7 दिन में रिपोर्ट तलब, अभिभावकों से ठगी का बड़ा खुलासा, जाने पूरा मामला....
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा घोटाला उजागर होता नजर आ रहा है। CG बोर्ड बनाम CBSE संबद्धता के नाम पर चल रहे खेल ने बिलासपुर में हड़कंप मचा दिया है, जहां कई निजी स्कूलों पर गंभीर आरोप लगे हैं कि वे CG बोर्ड की मान्यता लेकर खुद को CBSE से संबद्ध बताकर अभिभावकों से मोटी फीस वसूल रहे हैं। जैसे ही इस गड़बड़ी की परतें खुलनी शुरू हुईं, शिक्षा विभाग हरकत में आया और अब जिलेभर में निजी स्कूलों की मान्यता, दस्तावेज और संबद्धता की व्यापक जांच शुरू कर दी गई है।
राज्य सरकार द्वारा कक्षा 5वीं और 8वीं की केंद्रीकृत परीक्षा अनिवार्य किए जाने के बाद इस पूरे मामले का खुलासा हुआ। अब संकुल समन्वयकों को अपने-अपने प्रभार के निजी स्कूलों के दस्तावेजों की जांच कर 7 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, इस कार्रवाई को लेकर अंदरूनी असंतोष भी सामने आ रहा है। कई संकुल समन्वयकों का कहना है कि जिनको निरीक्षण का प्राधिकार नहीं, उनपर खुद की जिम्मेदारी थोपी जा रही है, जिससे प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जिले के बिल्हा ब्लॉक में ही 450 से अधिक निजी स्कूल संचालित हो रहे हैं, जिनमें कई स्कूलों के पास न तो वैध मान्यता है और न ही संबद्धता का नवीनीकरण अपडेट है। ऐसे में शिक्षा विभाग ने व्यापक स्तर पर निरीक्षण, भौतिक सत्यापन और दस्तावेज जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जांच में यह भी सामने आया है कि कई स्कूल CBSE का नाम लेकर एडमिशन दे रहे हैं, जबकि उनके पास केवल CG बोर्ड की अनुमति है। इन स्कूलों में न तो NCERT पाठ्यक्रम पूरी तरह लागू है और न ही CBSE की वैध संबद्धता स्पष्ट है। इसके अलावा कई संस्थानों में राज्य की अनिवार्य पाठ्यपुस्तकों की जगह निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें चलाकर नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है।
फीस वसूली को लेकर भी चौंकाने वाली अनियमितताएं सामने आई हैं। कई निजी स्कूल नियमों को दरकिनार कर बिना फीस रेगुलेशन कमेटी गठित किए मनमानी शुल्क वसूल रहे हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। इतना ही नहीं, RTE के तहत प्रवेशित बच्चों को मिलने वाली अनिवार्य सुविधाओं को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं, क्या उन्हें वास्तव में समान अवसर और संसाधन मिल रहे हैं या सिर्फ कागजों में ही व्यवस्था पूरी दिखाई जा रही है? वहीं, मामला तब और गंभीर हो जाता है जब बोर्ड परीक्षाओं में भी गड़बड़ी के संकेत मिलते हैं।
कुछ स्कूल छात्रों को निर्धारित नियमों के अनुरूप परीक्षा में शामिल नहीं कर रहे, जिससे उनकी शैक्षणिक वैधता पर संकट खड़ा हो सकता है। इसके साथ ही कई संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं जैसे सुरक्षित भवन, स्वच्छ शौचालय, पेयजल, प्रयोगशाला और पुस्तकालय की स्थिति भी जांच के घेरे में है। यह पूरा मामला न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि छात्रों के भविष्य से हो रहे संभावित खिलवाड़ की भी गंभीर चेतावनी देता है।
इस पूरे मामले ने शिक्षा तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि वर्षों से संचालित हो रहे इन संस्थानों की अनियमितताएं पहले क्यों नहीं पकड़ी गईं और संबंधित जिम्मेदार अधिकारी अब तक क्या कर रहे थे। जमीनी स्तर पर निरीक्षण और सत्यापन की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की होती है, उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। यदि समय रहते सख्ती नहीं बरती गई, तो यह स्थिति न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेगी, बल्कि अभिभावकों के भरोसे को भी गहरा नुकसान पहुंचाएगी। ऐसे में यह जांच केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित न रहकर जवाबदेही तय करने और व्यवस्था में ठोस सुधार लाने की दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकती है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
