जल संसाधन विभाग में 42 करोड़ का बड़ा टेंडर घोटाला ई टेंडरिंग नियम दरकिनार कर चहेती कंपनियों को बांटे गए 65 काम
रायपुर। जल संसाधन विभाग में ई टेंडरिंग व्यवस्था को धता बताते हुए एक बड़ा घोटाला सामने आया है। शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद 10 लाख रुपये से अधिक के कार्यों को पारदर्शी ई टेंडरिंग के बजाय मैन्युअल और सीमित कोटेशन पद्धति से चहेती एजेंसियों को बांट दिया गया। यह पूरा खेल लगभग 42 करोड़ 68 लाख रुपये का है जिसमें 65 अलग अलग निविदाएं और अनुबंध शामिल हैं।
विभागीय नियमों के अनुसार 10 लाख रुपये तक के कार्यों के लिए ही ऑफलाइन या सीमित कोटेशन की अनुमति होती है जबकि इससे अधिक लागत वाले सभी कार्यों के लिए ई टेंडरिंग अनिवार्य है। लेकिन जल संसाधन विभाग के विभिन्न संभागों में सर्वे डीपीआर वन स्वीकृति और डिमार्केशन जैसे कार्यों में इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। प्राप्त जानकारी के अनुसार कुल 65 कार्यों को केवल छह विशिष्ट कंपनियों के बीच बांट दिया गया। लोक निर्माण विभाग द्वारा 28 सितंबर 2001 को जारी उस परिपत्र का भी खुला उल्लंघन किया गया है जिसमें आंशिक कार्य पद्धति यानी पीस वर्क आर्डर सिस्टम पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। इस प्रतिबंध का मुख्य उद्देश्य ही अपारदर्शी कार्यादेश पद्धतियों पर रोक लगाना था लेकिन जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया।
इस वित्तीय अनियमितता में जिन कंपनियों को उपकृत किया गया उनमें अर्शी इंफ्रास्ट्रक्चर को 9 कार्यों के लिए 933.51 लाख रुपये अलीया इंफ्रास्ट्रक्चर को 13 कार्यों के लिए 844.92 लाख रुपये और नानक इंफ्रास्ट्रक्चर को 15 कार्यों के लिए 782.92 लाख रुपये के टेंडर दिए गए। इसी तरह बस्तर इंफ्रास्ट्रक्चर गंगरेल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैदेही इंफ्रास्ट्रक्चर को भी करोड़ों रुपये के काम दिए गए। इस पूरे मामले में सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति प्रतिस्पर्धी दरपत्रक और तुलनात्मक विवरण की गहन जांच की आवश्यकता है। यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में और किन अधिकारियों के दबाव या मिलीभगत से इतनी बड़ी राशि के टेंडर ऑफलाइन प्रक्रिया से गुपचुप तरीके से आवंटित कर दिए गए। यह स्पष्ट रूप से शासकीय धन का दुरुपयोग और वित्तीय नियमों का गंभीर उल्लंघन है जिसकी उच्च स्तरीय जांच अब अनिवार्य हो गई है।
