‘जेल अपवाद, जमानत अधिकार’ : उमर खालिद केस पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी, UAPA मामलों में भी आज़ादी को बताया सर्वोपरि

‘जेल अपवाद, जमानत अधिकार’ : उमर खालिद केस पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी, UAPA मामलों में भी आज़ादी को बताया सर्वोपरि

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को लेकर बेहद अहम और तीखी टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि “जमानत नियम है, जबकि जेल अपवाद।” अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत केवल सामान्य आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि UAPA जैसे कड़े कानूनों में भी समान रूप से लागू होता है। दिल्ली दंगा मामले में आरोपी उमर खालिद को लंबे समय तक राहत नहीं मिलने के बीच आई इस टिप्पणी ने देश की न्यायिक व्यवस्था, मानवाधिकार और संवैधानिक स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। शीर्ष अदालत का यह रुख ऐसे मामलों में बड़ा संदेश माना जा रहा है, जहां आरोपी वर्षों तक ट्रायल पूरा हुए बिना जेल में बंद रहते हैं।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी कथित नार्को-आतंकवाद मामले में गिरफ्तार सैयद इफ्तिखार अंद्राबी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए की। अदालत ने कहा कि किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में बंद नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब मुकदमे की प्रक्रिया लंबी खिंच रही हो। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘नजीब फैसले’ का हवाला देते हुए कहा कि बड़ी बेंच के निर्णय सभी छोटी बेंचों पर बाध्यकारी होते हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने जनवरी में आए उस फैसले पर भी अप्रत्यक्ष आपत्ति जताई, जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम को एक साल तक नई जमानत याचिका दाखिल करने से रोका गया था। जस्टिस भुइयां ने कहा कि स्वतंत्रता का अधिकार कोई औपचारिक संवैधानिक शब्द नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल आत्मा है, जिसकी रक्षा न्यायपालिका का दायित्व है। अदालत की यह टिप्पणी उन मामलों में बेहद अहम मानी जा रही है, जहां आरोपी लंबे समय तक बिना ट्रायल पूरा हुए जेल में रहते हैं।

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कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में UAPA और अन्य विशेष कानूनों के तहत चल रहे मामलों पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है। अदालत ने जिस तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी है, उससे यह संकेत मिल रहा है कि लंबी हिरासत और धीमी न्यायिक प्रक्रिया पर अब न्यायपालिका अधिक संवेदनशील रुख अपना सकती है।

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