Jaipur Land Dispute: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, 400 करोड़ की जमीन केस में हाईकोर्ट का फैसला रद्द, होगी दोबारा सुनवाई

Jaipur Land Dispute: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, 400 करोड़ की जमीन केस में हाईकोर्ट का फैसला रद्द, होगी दोबारा सुनवाई

नई दिल्ली। जयपुर की करीब 400 करोड़ रुपये मूल्य की बेशकीमती जमीन को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में 14 साल पुराने फैसले को पलटते हुए जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और पूर्व राजपरिवार की सदस्य व वर्तमान उप मुख्यमंत्री दीया कुमारी के परिवार के बीच चल रहे भूमि विवाद को दोबारा सुनवाई के लिए खोल दिया है।

हाईकोर्ट का फैसला रद्द, JDA की अपील पर फिर होगी सुनवाई
न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वर्ष 2011 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को बिना किसी अपीलीय जांच के बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट द्वारा JDA की अपील को तकनीकी आधार पर खारिज करना उचित नहीं था। शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर JDA की पहली अपील पर मेरिट के आधार पर निर्णय ले और इसकी अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

क्या है 400 करोड़ की जमीन का पूरा विवाद?
यह विवाद जयपुर के उस भूखंड से जुड़ा है, जिसे पुराने राजस्व रिकॉर्ड में हथरोई गांव के नाम से जाना जाता था। समय के साथ यह इलाका मध्य जयपुर के शहरी विस्तार का हिस्सा बन गया, जहां आज कई प्रमुख रियल एस्टेट प्रोजेक्ट, स्कूल, अस्पताल और नागरिक सुविधाएं मौजूद हैं। जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने इस जमीन को अपने रिकॉर्ड में ‘सिवाई चक’ (बिना खेती वाली सरकारी भूमि) के रूप में दर्ज किया था। JDA के अनुसार, मौजूदा समय में इस जमीन की बाजार कीमत करीब 400 करोड़ रुपये है।

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JDA का दावा: 1990 के दशक में लिया गया था कब्जा
JDA की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि 1990 के दशक में नगर प्रशासन ने इस जमीन पर कब्जा ले लिया था। प्राधिकरण ने पूर्व शाही परिवार के उस दावे को चुनौती दी है, जिसमें जमीन को 1949 के विलय समझौते के तहत निजी संपत्ति बताया गया था। JDA का कहना है कि यह भूमि कभी भी शाही परिवार की निजी संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं की गई, बल्कि मुआवजा देकर 1993 से 1995 के बीच बड़े हिस्से का विधिवत अधिग्रहण किया गया था।

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2005 में शाही परिवार ने ठोका मालिकाना दावा
वहीं, वर्ष 2005 में पूर्व शाही परिवार की ओर से जमीन पर मालिकाना हक की घोषणा को लेकर मुकदमा दायर किया गया। करीब छह साल बाद, 24 नवंबर 2011 को ट्रायल कोर्ट ने शाही परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें जमीन का मालिक घोषित कर दिया। इस फैसले में कोर्ट ने राज्य सरकार की राजस्व प्रविष्टियों को खारिज कर दिया और JDA को जमीन में दखल देने से रोक दिया।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ JDA ने 2012 में पहली अपील दायर की थी, जिसे नवंबर 2023 में खारिज कर दिया गया। हालांकि, एक साल बाद इसे पुनः बहाल किया गया। इसके बावजूद 15 सितंबर 2024 को राजस्थान हाईकोर्ट ने इस विवाद में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद 10 दिसंबर को JDA ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। प्राधिकरण का तर्क है कि पब्लिक टाइटल, अधिग्रहण की वैधता, राजस्व रिकॉर्ड के निपटारे और संविधान के अनुच्छेद 363 के बावजूद तकनीकी आधार पर सरकारी जमीन निजी हाथों में चली गई।

अब सबकी नजरें हाईकोर्ट की नई सुनवाई पर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब एक बार फिर यह सवाल केंद्र में आ गया है कि जयपुर की 400 करोड़ की जमीन का असली मालिक कौन है? आने वाले हफ्तों में राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला इस हाई-प्रोफाइल जमीन विवाद की दिशा तय करेगा।

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