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कागजी ढाल में गौ तस्करी? मऊगंज में 28 गौवंशों से भरी तीन पिकअप जब्त, पंचायत और सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
मऊगंज। रीवा–मऊगंज जिला सीमा से सामने आया एक मामला प्रशासनिक निगरानी और पंचायत व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर इशारा कर रहा है। लौर थाना क्षेत्र के पटपरा तिराहे पर ग्रामीणों की सतर्कता से गौवंश से भरी तीन पिकअप गाड़ियों को रोका गया, जिनमें 28 गौवंशों को अमानवीय हालात में ठूंसकर ले जाया जा रहा था। कार्रवाई के बाद जो दस्तावेज सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
अमानवीय परिवहन, ग्रामीणों ने रोकी गाड़ियां
घटना लौर थाना अंतर्गत पटपरा तिराहे की है, जहां ग्रामीणों ने घेराबंदी कर तीन पिकअप वाहन MP17 G 3621, MP17 ZH 1466 और MP17 G 3462 को रोका। वाहन की तलाशी के दौरान पाया गया कि गौवंशों को न तो चारा-पानी उपलब्ध था और न ही परिवहन के न्यूनतम मानकों का पालन किया गया था। हालात इतने खराब थे कि कई पशु घायल अवस्था में मिले।
आरोपी पकड़े गए, लेकिन कहानी दस्तावेजों में उलझी
पुलिस ने मौके से महेंद्र गुप्ता, अंकित साकेत और सुरेश साहू (निवासी—मनगवां क्षेत्र) को हिरासत में लेकर पशु क्रूरता अधिनियम की धारा 11(1)(घ) के तहत मामला दर्ज किया। हालांकि, जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों ने कई चौंकाने वाले सवाल खड़े कर दिए।
पंचायत पत्राचार पर सवाल
जांच में सामने आया कि मऊगंज जिले की आमोखर ग्राम पंचायत के सरपंच द्वारा 26 जनवरी को एक पत्र जारी कर रीवा जिले की तिवरीगवां पंचायत से 70 गौवंशों की मांग की गई थी। सबसे हैरानी की बात यह है कि जब तिवरीगवां पंचायत के सरपंच से संपर्क किया गया, तो उन्होंने किसी भी प्रकार के पत्राचार से पूरी तरह इनकार कर दिया। सवाल उठता है कि एक पंचायत का सरपंच दूसरे जिले की पंचायत के पशुओं को लेकर पत्र कैसे जारी कर सकता है, वह भी बिना संबंधित पंचायत की जानकारी के?
गौशाला की क्षमता पर भी संदेह
सूत्रों के मुताबिक, आमोखर गौशाला की क्षमता लगभग 400 पशुओं की है, जबकि वहां पहले से ही 500 से अधिक गौवंश मौजूद हैं। ऐसे में दूसरे जिले से अतिरिक्त पशु लाने का औचित्य क्या है? यही कारण है कि पूरा मामला गौ-सेवा नहीं, बल्कि संगठित गौ-तस्करी की ओर इशारा कर रहा है।
पुराने पत्र दिखाकर बचाव की कोशिश
आरोपियों द्वारा बचाव में रीवा जिला प्रशासन का कुछ माह पुराना पत्र भी प्रस्तुत किया गया, जिसका मौजूदा परिवहन और जब्ती से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं पाया गया। इससे संदेह और गहरा गया है कि कागजी औपचारिकताओं का इस्तेमाल ढाल के रूप में किया जा रहा था।
कार्रवाई सीमित, जांच पर निगाहें
ग्रामीणों आशुतोष मिश्रा और गोलू गौतम की सजगता से एक संभावित बड़े रैकेट का खुलासा हुआ है। बावजूद इसके, अब तक की कार्रवाई केवल पशु क्रूरता की धाराओं तक सीमित नजर आ रही है। प्रश्न यह है कि क्या कागजी विसंगतियों की विस्तृत जांच होगी? क्या बिना अधिकार क्षेत्र के पत्र जारी करने वाले सरपंचों पर कार्रवाई होगी?
क्या इस पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड तक पुलिस पहुंचेगी?
फिलहाल, एसडीओपी सचि पाठक ने पूरे मामले में वैधानिक और निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है। लेकिन यह मामला अब केवल गौवंशों की क्रूरता का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पंचायत प्रणाली की पारदर्शिता की भी परीक्षा बन चुका है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
