ईरान-इजरायल युद्ध का असर: खाड़ी देशों पर मंडराया आर्थिक संकट, डॉलर की कमी होने पर युआन का रुख कर सकता है UAE

ईरान-इजरायल युद्ध का असर: खाड़ी देशों पर मंडराया आर्थिक संकट, डॉलर की कमी होने पर युआन का रुख कर सकता है UAE

दुबई/वाशिंगटन (NJV न्यूज़ डेस्क): मध्य पूर्व में जारी तनाव और ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष का सीधा असर अब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी साफ तौर पर दिखने लगा है। नवीनतम आर्थिक रिपोर्टों के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अब तक इस विनाशकारी युद्ध के सबसे बुरे आर्थिक प्रभावों से खुद को बचाने में कामयाबी तो हासिल कर ली है, लेकिन भविष्य के संकेत चिंताजनक बने हुए हैं। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और आने वाले समय में बाजार में अमेरिकी डॉलर की भारी कमी पैदा होती है, तो UAE अपनी अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुचारू रखने के लिए चीनी मुद्रा 'युआन' (Yuan) जैसी अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की ओर रुख करने को मजबूर हो सकता है।

युद्ध का खौफ और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव अब केवल इन दोनों देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के विस्तार के दौरान ईरान ने इजरायल के साथ-साथ UAE समेत अन्य खाड़ी देशों को भी निशाना बनाया और क्षेत्र में 2800 से ज्यादा ड्रोन तथा मिसाइलें दागीं। हालांकि, उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों की मदद से इनमें से ज्यादातर हमलों को हवा में ही रोक लिया गया और किसी बड़े नुकसान को टाल दिया गया, लेकिन इस खौफनाक स्थिति ने क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।

इस हमले ने UAE को कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से अमेरिका के और अधिक करीब ला दिया है। गौरतलब है कि युद्ध छिड़ने से पहले, UAE क्षेत्रीय अस्थिरता से बचने और खाड़ी में शांति बनाए रखने के उद्देश्य से ईरान के साथ अपने राजनयिक और वित्तीय संबंधों को लगातार मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन अब तात्कालिक सुरक्षा चिंताओं के कारण उसे अपनी पुरानी नीतियां बदलनी पड़ी हैं।

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अर्थव्यवस्था की मजबूती और डॉलर का संभावित विकल्प

 

वर्तमान परिदृश्य में, UAE का आर्थिक ढांचा अभी भी काफी मजबूत स्थिति में है।

 मुद्रा पेगिंग:UAE की राष्ट्रीय मुद्रा 'दिरहम' अभी भी पूरी तरह से अमेरिकी डॉलर के साथ पेग्ड है, जिससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में स्थिरता बनी हुई है।

 

 विदेशी मुद्रा भंडार: देश के पास इस समय लगभग 270 बिलियन डॉलर का एक विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) मौजूद है, जो किसी भी त्वरित संकट से निपटने में कारगर है।

इसके बावजूद, अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक युद्ध चलने, प्रमुख तेल निर्यात मार्गों के गंभीर रूप से प्रभावित होने और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने से एक अभूतपूर्व जोखिम पैदा हो सकता है। ऐसे आपातकालीन हालात में, यदि डॉलर की तरलता घटती है, तो व्यापार संतुलन बनाए रखने के लिए युआन एक संभावित विकल्प बनकर उभर सकता है।

 

तेल लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचे पर संकट

 

युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पहले से ही दबाव में है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) की बैठकों के दौरान, अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारियों ने खाड़ी देशों के शीर्ष प्रतिनिधियों को बुलाकर बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और युद्ध के बाद की आर्थिक रिकवरी योजनाओं पर गहन चर्चा की।

इस उच्च स्तरीय बैठक में सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जादान ने एक गंभीर चेतावनी जारी की। उन्होंने स्पष्ट किया कि हालात तुरंत सुधरने वाले नहीं हैं। उनके अनुसार, युद्ध की समाप्ति के बाद भी सामान्य तेल लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह से बहाल होने में कम से कम जून के अंत तक का समय  लग सकता है। यह देरी वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव ला सकती है।

 

 S&P ग्लोबल की चेतावनी और कर्ज का सहारा

 

प्रसिद्ध वैश्विक रेटिंग एजेंसी S&P ग्लोबल' ने अपनी ताजा रिपोर्ट में मूल्यांकन किया है कि UAE के पास मौजूद मजबूत वित्तीय बफर उसे इस संकट के शुरुआती झटके को झेलने में काफी मदद करेंगे। लेकिन, एजेंसी ने यह भी जोड़ा कि यदि यह क्षेत्रीय संकट उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंचता है, तो यह न केवल तेल निर्यात को बाधित करेगा, बल्कि समग्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी गहरे संकट में डाल सकता है।

बाजार में पर्याप्त लिक्विडिटी (नकद तरलता) बनाए रखने और किसी भी आकस्मिक आर्थिक झटके से निपटने के लिए खाड़ी देश अभी से एहतियाती कदम उठा रहे हैं। हाल के दिनों में, UAE और बहरीन ने अपने वित्तीय संसाधनों को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से अरबों डॉलर का कर्ज उठाया है। यह कदम स्पष्ट करता है कि युद्ध की प्रत्यक्ष आंच से भले ही खाड़ी देश बचे हों, लेकिन इसकी आर्थिक तपिश ने उन्हें अपनी भविष्य की रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

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