सर्पदंश मुआवजा घोटाला: काले-पीले दलालों की भूमिका अहम, कोटा की बजाय रतनपुर में हुए फर्जी पोस्टमार्टम ....

सर्पदंश मुआवजा घोटाला: काले-पीले दलालों की भूमिका अहम, कोटा की बजाय रतनपुर में हुए फर्जी पोस्टमार्टम ....

बिलासपुर | जिले के चर्चित 17 करोड़ 24 लाख रुपये के सर्पदंश मुआवजा गबन मामले में जांच की सुई अब ग्रामीण इलाकों की तरफ घूम गई है। पुलिस के निशाने पर अब कोटा, रतनपुर और बेलगहना के इलाके हैं। इस मामले में शवों का पोस्टमार्टम कराने के तरीके और दलालों के काम करने की शैली पर नई जानकारी निकलकर आ रही है। बेलगहना क्षेत्र में सक्रिय 'काला-पीला' के नाम से चर्चित सर्पदंश के दलालों की बनाई गई संपत्ति और उनकी पूरी कार्यप्रणाली की अब सघन जांच की जाएगी।

नियम ताक पर रखकर रतनपुर में कराए पोस्टमार्टम

इस पूरे मामले में बिचौलियों ने पोस्टमार्टम को लेकर बड़ा खेल किया है। जानकारी के अनुसार, कोनचरा, बेलगहना, खोंगसरा और इसके आसपास के क्षेत्रों में हुई मौतों का पोस्टमार्टम नियम के तहत कोटा में कराया जाना था। इसके उलट, सरकारी खजाने की राशि डकारने की नीयत से इन सभी मामलों में पोस्टमार्टम रतनपुर में कराए गए। बताया जा रहा है कि बेलगहना और खोंगसरा के जितने भी पोस्टमार्टम रतनपुर भेजे गए, वे सभी फर्जी हैं। पुलिस अब इन तमाम पुरानी फाइलों को निकालकर उनकी बारीकी से जांच कर रही है।

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टाटीधार से सामने आया बिचौलियों का नया नेटवर्क

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टाटीधार, कुरदुर और आसपास के गांवों से पुलिस के हाथ कई नए तथ्य लगे हैं। बेलगहना इलाके में दलालों का एक नया नेटवर्क काम कर रहा था। इसमें पीला राम जोशी, दुर्गा बघेल, पंच राम, भानु और सूरज मिश्रा के नाम सामने आए हैं। यह सभी लोग बिचौलिए के तौर पर काम कर रहे थे। अकेले टाटीधार ग्राम पंचायत में ही लगभग 10 से 15 लोगों के नाम पर मुआवजे की फर्जी फाइलें तैयार होने की बात सामने आई है। मृतक कमलेश सोनवानी और रोहन जोशी के मामले में तो दस्तावेजों में उन्हें सिम्स (CIMS) अस्पताल में भर्ती दिखाया गया, जबकि उनका पोस्टमार्टम बेलगहना में ही कर दिया गया। यह पूरी रकम झूठे पंचनामे, फर्जी रिपोर्ट और गलत दस्तावेजों के सहारे निकाली गई।

बड़े अफसरों की भूमिका पर नजर 

मुआवजे में हुए इस भ्रष्टाचार की आंच अब प्रशासनिक महकमे के बड़े अफसरों तक पहुंच गई है। हालांकि यह बड़े अधिकारी न्यायधीश (जज) होने का बहाना बनाकर मामले से बचने की तैयारी कर रहे हैं लेकिन जिस तरह से मामले सामने आए हैं उसने उनकी भूमिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

या यूं कहे कि इनकी भूमिका को प्रमाणित कर दिया है। चर्चा है कि अधिकारियों द्वारा ये कहे जाने की वो जज है। आम लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है लोगो का कहना है कि जज भी आम व्यक्ति है और यदि वो गलती करें तो सजा मिलनी चाहिए.. इस मामले में 

तहसील और एसडीएम कार्यालय के तीन लिपिक — नरेंद्र कौशिक, हरिशंकर राठौर और गरीब राम बिंझवार — पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं। अब सवाल यह है कि एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार और पटवारी की अनुशंसा और हस्ताक्षर के बिना इतनी बड़ी रकम कैसे जारी कर दी गई। पुलिस दस्तावेजों में हुई इस हेराफेरी के आधार पर इन अफसरों की भूमिका खंगाल रही है। सूत्र बताते है कि मामले में पुलिस के हाथ अहम सबूत लगे है जो इन अधिकारियों की गिरहबान तक पहुंचने के लिए काफी है। 

मास्टरमाइंड फरार, सिम्स के पांच डॉक्टर और कुछ अन्य रडार पर 

वर्ष 2021 से 2024 के बीच फांसी, हार्ट अटैक या आत्महत्या जैसी सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर 431 मामलों में हर बार चार-चार लाख रुपये निकाले गए। पुलिस ने अब तक सिम्स की पूर्व डॉक्टर प्रियंका सोनी, अधिवक्ता, बैंककर्मी और दो नगर सैनिकों समेत कुल 14 लोगों को जेल भेज दिया है। सिम्स के पांच अन्य डॉक्टर भी पुलिस की नजर में हैं। वहीं, इस प्रकरण का मुख्य साजिशकर्ता बताया जा रहा अधिवक्ता श्रवण वस्त्रकार अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। ग्रामीण क्षेत्रों से नए दलालों के नाम आने के बाद आने वाले दिनों में गिरफ्तारियों का यह आंकड़ा और तेज होने की संभावना है।

 

 

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