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मित्तल की फैक्ट्री या मौत का कुआं: सुरक्षा के नाम पर ठेंगा, मालिक की जिद ने ले ली मासूम की जान
बिलासपुर। सिरगिट्टी के मित्तल फर्नीचर फैक्ट्री में लगी भीषण आग ने मैनेजमेंट और मालिक संजय मित्तल की काली करतूतों की पोल खोल दी है। इस हादसे में आयुष नाम के एक नौजवान की जिंदा जलकर मौत हो गई, जिसके अवशेषों को परिजनों ने कपड़ों में समेटकर एंबुलेंस में रखा। जांच में सामने आया कि फैक्ट्री संचालक संजय मित्तल ने सुरक्षा के सारे नियमों को ताक पर रख दिया था। जिस वक्त आग लगी, मृतक आयुष और उसके भाई आशीष ने चेतावनी दी थी कि मोटर से चिंगारी निकल रही है, लेकिन मैनेजर ने काम जल्द खत्म करने का दबाव डाला। जैसे ही बटन दबा, जोरदार धमाका हुआ और आयुष को बाहर निकलने तक का मौका नहीं मिला। फैक्ट्री में न तो खिड़की थी और न ही आग बुझाने का कोई इंतजाम, बस चारों तरफ मौत बनकर फैला 30 हजार लीटर तारपीन का तेल था।
नाम केमिकल का और काम फर्नीचर का, अफसरों की मिलीभगत से चल रहा था खेल
औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। यह फैक्ट्री उद्योग विभाग में एसएस केमिकल के नाम से रजिस्टर्ड है, लेकिन यहां गैरकानूनी तरीके से फर्नीचर का काम किया जा रहा था। फैक्ट्री के अंदर 3-3 हजार लीटर की 10 टंकियां भरी हुई थीं और बाहर 20 हजार लीटर का टैंकर खड़ा था। इतनी बड़ी मात्रा में ज्वलनशील तेल रखने के बावजूद वहां न रेत थी, न पानी और न ही फायर सिस्टम। बिजली की तारें भी जगह-जगह से कटी-फटी और खुली पड़ी थीं। संजय मित्तल ने मुनाफा कमाने के चक्कर में मजदूरों को मौत के पिंजरे में झोंक दिया था।
साहबों के पास जवाब नहीं: कोई शिविर में व्यस्त तो कोई फोन काटने में मस्त
इतने बड़े हादसे के बाद भी सरकारी विभागों के अफसर अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आ रहे हैं। उद्योग विभाग के मुख्य महाप्रबंधक सीआर टेकाम से जब जोखिम वाले उद्योगों की जानकारी मांगी गई, तो उन्होंने शिविर का बहाना बनाकर फोन काट दिया। वहीं जनरल मैनेजर सीडी प्रसाद के पास भी अवैध रूप से चल रही इस फैक्ट्री को लेकर कोई साफ जवाब नहीं था। एसएसपी रजनेश सिंह ने बताया कि तारपीन तेल रखने के लाइसेंस और फायर सेफ्टी की बारीकी से जांच होगी। पर्यावरण विभाग की रश्मि श्रीवास्तव ने बताया कि इस फर्म ने विभाग से कोई अनुमति ही नहीं ली थी। विजय सोनी ने बताया कि फैक्ट्री में सुरक्षा के कोई मापदंड नहीं मिले।
मजदूरों का शोषण: 10 घंटे की हाड़तोड़ मेहनत और बदले में सिर्फ 350 रुपए
हादसे में बाल-बाल बचे आशीष ने बताया कि वह और उसका भाई आयुष पिछले दो महीने से यहां काम कर रहे थे। संजय मित्तल की फैक्ट्री में मजदूरों का खून चूसा जा रहा था। सुबह 9:30 से रात 8:30 बजे तक, यानी 10 घंटे काम लिया जाता था और मजदूरी के नाम पर सिर्फ 350 रुपए दिए जाते थे। लंच में भी बाहर जाने की मनाही थी और ओवरटाइम का एक पैसा नहीं मिलता था। हद तो तब हो गई जब हादसे के बाद आशीष ने भाई की खबर घर देने के लिए लोगों से मोबाइल मांगा, लेकिन किसी ने मदद नहीं की।
ग्राफिक रिपोर्ट: मौत की फैक्ट्री का काला चिट्ठा

यह पूरी घटना चीख-चीख कर कह रही है कि संजय मित्तल की लापरवाही और अफसरों की अनदेखी ने एक हंसते-खेलते परिवार का चिराग बुझा दिया। अब सवाल यह है कि क्या सिर्फ जांच के नाम पर खानापूर्ति होगी या इस मौत के जिम्मेदार असली गुनहगारों
को कड़ी सजा मिलेगी?
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
