फर्जी रसीदें लेकर प्रेस क्लब का सदस्य बनने निकले थे, हाईकोर्ट ने दिखाई घर की राह; प्रशासन ने भी दावा किया खारिज 

फर्जी रसीदें लेकर प्रेस क्लब का सदस्य बनने निकले थे, हाईकोर्ट ने दिखाई घर की राह; प्रशासन ने भी दावा किया खारिज 

बिलासपुर। प्रेस क्लब की राजनीति में मलाई खाने के चक्कर में पिछले दरवाजे से घुसे कथित पत्रकारों को हाईकोर्ट ने तगड़ा झटका दिया है। फर्जी सदस्यता के सहारे क्लब पर कब्जा करने का सपना देख रहे इन लोगों की याचिका अदालत ने खारिज कर दी है। दरअसल, साल 2021-23 की पुरानी रसीदें काटकर नए सदस्य बनाने का जो खेल पूर्व अध्यक्ष इरशाद अली और सचिव दिलीप यादव की जोड़ी ने खेला था, उसकी पोल अब पूरी तरह खुल चुकी है।

बैक डेट की रसीदों ने बिगाड़ा खेल

प्रेस क्लब के गलियारों में चर्चा है कि खुद को पत्रकार बताने वाले कई लोग जेब में रसीदें लेकर इस उम्मीद में घूम रहे थे कि वे चुनाव में वोट डालेंगे। लेकिन मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। कोर्ट की सुनवाई में सामने आया कि सदस्यता देने के नाम पर जो रसीदें बांटी गईं, वे उस कार्यकाल की थीं ही नहीं। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे 2025 में बैठकर 2021 का टिकट कटाना। जस्टिस ने इन जुगाड़ू सदस्यों के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने भी जांच बैठाई और इन रसीदधारी सदस्यों की सूची को कूड़ेदान के हवाले कर दिया।

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रजिस्ट्रार ने भी लगाई थी तगड़ी फटकार

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इससे पहले रजिस्ट्रार फर्म्स एवं संस्थाएं भोई साहू (IAS) ने 18 नवंबर को  आदेश जारी किया था। उन्होंने 19 सितंबर को हुई चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह दूषित करार दिया था। रजिस्ट्रार ने पाया कि क्लब ने कोई रिकॉर्ड ही जमा नहीं किया था। नोटिस का जवाब देने के बजाय मनमानी की गई और अवैध सदस्यों के दम पर कुर्सी हथिया ली गई। रजिस्ट्रार साहू ने अधिनियम की धारा 33(ग) का हंटर चलाते हुए निर्वाचित कार्यकारिणी को भंग कर दिया था।

 कलेक्टर ने सहायक पंजीयक ज्ञान प्रकाश साहू को प्रशासक नियुक्त किया है अब क्लब की चाबी प्रशासक के पास है। ज्ञान प्रकाश साहू ने बताया कि अब क्लब की नियमावली के हिसाब से पारदर्शी चुनाव कराए जा रहे है। 
उनका का कहना है कि अब केवल उन्हीं पत्रकारों को वोटिंग का अधिकार मिलेगा जो वास्तव में पात्रता रखते हैं, न कि अपात्र 

विवाद के मुख्य बिंदु: एक नजर में

फर्जी सदस्यता का जाल: पूर्व अध्यक्ष और सचिव पर आरोप है कि उन्होंने नियम ताक पर रखकर चहेतों को सदस्य बनाया।

रिकॉर्ड में भारी चूक:  एनुअल रिटर्न फाइल नहीं की गई, जो बड़ी लापरवाही है।

अवैध चुनाव: रजिस्ट्रार ने सितंबर में हुए चुनाव को पहले ही गैरकानूनी घोषित कर दिया था।

कोर्ट का डंडा: हाईकोर्ट ने रसीदों की तारीख में हेराफेरी पकड़ी और याचिकाओं को खारिज कर दिया।

 

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