बिलासपुर में अंगद के पांव की तरह जमे अधीक्षक, 6 साल से एक ही कुर्सी पर राज, कलेक्टर से शिकायत

बिलासपुर में अंगद के पांव की तरह जमे अधीक्षक, 6 साल से एक ही कुर्सी पर राज, कलेक्टर से शिकायत

बिलासपुर। न्यायधानी के भू अभिलेख कार्यालय में एक अधिकारी का रुतबा ऐसा है कि सरकारें बदल गईं लेकिन उसकी कुर्सी नहीं हिली। पिछले छह साल से अधीक्षक खिलेंद्र सिंह यादव यहां अंगद के पांव की तरह जमे हुए हैं। अब इनके खिलाफ कलेक्टर से गंभीर शिकायत की गई है। शिकायत में दावा किया गया है कि साहब ने शासन की आंखों में धूल झोंकर अपनी कुर्सी बचा रखी है और दफ्तर को वसूली का अड्डा बना दिया है। शिकायत में आरोप है कि पिछली सरकार में उनकी राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत थी कि तमाम शिकायतों के बाद भी उनका बाल बांका नहीं हुआ।

आंखों में धूल झोंकने का खेल

नियम कहता है कि किसी भी अधिकारी को एक ही जगह तीन साल से ज्यादा नहीं रहना चाहिए। लेकिन खिलेंद्र सिंह यादव छह साल से बिलासपुर में ही डटे हैं। शिकायत के मुताबिक जब शासन ने पदस्थापना की जानकारी मांगी तो उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को गुमराह कर दिया। उन्होंने बताया कि वे कुछ महीने पहले ही आए हैं जबकि हकीकत पूरा विभाग जानता है। अपनी कुर्सी बचाने के लिए शासन को गलत जानकारी भेजना अपने आप में बड़ा अपराध है लेकिन रसूख के आगे नियम भी बौने साबित हो रहे हैं।

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पूर्व कलेक्टर सौरभ कुमार ने किया था निलंबित

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यह पहली मर्तबा नहीं है जब श्री यादव पर इस तरह के आरोप लगे हैं । इससे पहले सत्ताधारी दल के भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनकी शिकायत की थी। मामला जिला स्तरीय भर्ती में गोपनीय डेटा लीक करने का था। तब तत्कालीन कलेक्टर सौरभ कुमार ने जांच करवाई और दोषी पाए जाने पर खिलेंद्र यादव को निलंबित कर दिया था। लेकिन सिस्टम का खेल देखिए कि जैसे ही कलेक्टर सौरभ कुमार का तबादला हुआ साहब ने फिर से जुगाड़ लगाया और उसी मलाईदार कुर्सी पर वापस आ गए। निलंबन के बाद भी उसी जगह पोस्टिंग मिलना उनकी ताकत की कहानी का स्पष्ट उदाहरण है। 

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साहब की जमीन के खेल में मास्टरी

सूत्र बताते हैं कि राजस्व विभाग में असली खेल यही अधिकारी खेलता हैं। विवादित जमीनों की खरीदी बिक्री पर लगी रोक को हटाने के नाम पर मोटी रकम की मांग की जाती है। इतना ही नहीं सीमांकन के काम में भी इसका सीधा दखल है। आरोप है कि ये सीमांकन दल पर दबाव डालकर एकतरफा रिपोर्ट बनवाते हैं और इसका ठेका खुद ले लेते हैं। पहले डायवर्सन का काम भी यही देखते थे और मनमाने नियम बनाकर लोगों को परेशान करते थे। बाद में शिकायत होने पर तत्कालीन कलेक्टर ने इनसे यह काम छीनकर तहसीलदारों को दे दिया था।

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ट्रांसफर पोस्टिंग और मीडिया से सेटिंग 

पटवारियों और आरआई के तबादलों में भी साहब की दुकान चलती है। शिकायत है कि सीक्रेट लिस्ट पहले ही लीक कर दी जाती है और मनचाही पोस्टिंग के लिए बोली लगती है। चर्चा तो यहां तक है कि शहर के कुछ मीडियाकर्मी भी इस अधिकारी के साथ मिले हुए हैं और मिलकर अपनी दुकान चला रहे हैं। अब गेंद वर्तमान कलेक्टर के पाले में है। देखना होगा कि इस रसूखदार अधिकारी पर कार्रवाई होती है या फिर जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाएगी।

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