कुदरती रंगों से सजेगी होली: बस्तर की ‘बिहान दीदियां’ तैयार कर रहीं हर्बल गुलाल, सेहत और पर्यावरण दोनों सुरक्षित, जाने डिटेल्स.....

कुदरती रंगों से सजेगी होली: बस्तर की ‘बिहान दीदियां’ तैयार कर रहीं हर्बल गुलाल, सेहत और पर्यावरण दोनों सुरक्षित, जाने डिटेल्स.....

बस्तर: इस बार होली के रंग केवल चटख नहीं, बल्कि सेहतमंद और पर्यावरण-अनुकूल भी होंगे। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत संचालित ‘बिहान’ से जुड़ी बस्तर की महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं। यह पहल न केवल सुरक्षित होली का संदेश दे रही है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी मजबूत कदम साबित हो रही है।

सब्जियों और फूलों से बन रहा सतरंगी गुलाल
हर्बल गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक तत्वों से तैयार किया जा रहा है। पलाश के फूलों से केसरिया, पालक भाजी से हरा और लाल भाजी व चुकंदर से लाल रंग तैयार किया जा रहा है। इन सभी प्राकृतिक अर्कों को कॉर्न फ्लावर बेस में मिलाकर सुरक्षित और मुलायम गुलाल बनाया जाता है। इसके साथ गुलाब, गेंदा और पलाश की पंखुड़ियां, गुलाब जल तथा इत्र मिलाकर इसे सुगंधित और आकर्षक रूप दिया जाता है। किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ का उपयोग न होने से यह गुलाल त्वचा, आंखों और बालों के लिए पूरी तरह सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल है।

वैज्ञानिक प्रशिक्षण के साथ नई शुरुआत
जिले के विभिन्न विकासखंडों के 9 स्व-सहायता समूहों की महिलाओं को क्रांतिकारी डेबरीधूर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, जगदलपुर में दो दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण में आधुनिक और वैज्ञानिक पद्धतियों से प्राकृतिक रंग तैयार करने की विधि सिखाई गई, ताकि उत्पाद गुणवत्ता और बाजार मानकों पर खरा उतर सके।

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1000 किलो उत्पादन का लक्ष्य, शहर से गांव तक बिक्री
प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने इस वर्ष 500 से 1000 किलो तक हर्बल गुलाल तैयार करने का लक्ष्य रखा है। तैयार उत्पाद को जगदलपुर शहर के प्रमुख स्थानों, शासकीय कार्यालयों और जनपद स्तर के बाजारों में विशेष स्टॉल लगाकर बेचा जाएगा। उद्देश्य है कि आम नागरिकों तक शुद्ध, देशी और सुरक्षित गुलाल आसानी से पहुंच सके।

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स्वास्थ्य और स्वरोजगार, दोनों में रंग भरती पहल
बाजार में मिलने वाले सिंथेटिक रंगों में अक्सर हानिकारक रसायन होते हैं, जो त्वचा एलर्जी, जलन और आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में बिहान की दीदियों की यह पहल सुरक्षित होली का विकल्प प्रदान कर रही है। यह प्रयास केवल रंगों का उत्पादन नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सशक्तिकरण की नई राह खोल रहा है। बस्तर की यह पहल दिखा रही है कि जब परंपरा, प्रकृति और नवाचार साथ आते हैं, तो त्योहार भी स्वास्थ्य और खुशहाली का संदेश बन जाते हैं।

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