सर्पदंश नहीं, साजिश से मिली मौत की फाइलें! 17 करोड़ के मुआवजा घोटाले में रोज नए खुलासे, डॉक्टर से लेकर बाबुओं तक की गिरफ्तारी
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सरकारी मुआवजे के नाम पर सामने आए 17 करोड़ रुपये से अधिक के कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच लगातार नए खुलासे कर रही है। फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार कर सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत दर्शाने के इस संगठित खेल की जांच अब स्वास्थ्य विभाग से आगे बढ़कर राजस्व विभाग तक पहुंच गई है। पुलिस ने पहले सिम्स की तत्कालीन डॉक्टर प्रियंका सोनी को गिरफ्तार कर जेल भेजा, जिन पर निसार खान और लता सूर्यवंशी समेत कई मामलों में फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाने का आरोप है। वहीं अब कार्रवाई का दायरा बढ़ाते हुए एसडीएम और तहसीलदार कार्यालय में पदस्थ तीन बाबुओं को भी गिरफ्तार किया गया है।
बिलासपुर जिले में सर्पदंश से मौत के नाम पर सरकारी मुआवजा हासिल करने के लिए किए गए कथित 17.24 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच लगातार नए मोड़ ले रही है। आरोप है कि सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत बताकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और उनके आधार पर सरकारी मुआवजा स्वीकृत कराकर राशि का बंदरबांट किया गया। मामले में पुलिस अब पूरे नेटवर्क की भूमिका की जांच कर रही है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग से लेकर राजस्व विभाग तक के अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता की पड़ताल की जा रही है।
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब विधानसभा के मानसून सत्र में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से सर्पदंश से मौत के संदिग्ध मामलों और मुआवजा वितरण में अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। इसके बाद प्रशासन और पुलिस ने रिकॉर्ड की गहन जांच शुरू की, जिसमें कई मामलों में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं।
जांच में पता चला कि कई मामलों में मौत का वास्तविक कारण कुछ और था, लेकिन दस्तावेजों में उसे सर्पदंश से हुई मौत दर्शाया गया। आरोप है कि फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पंचनामा और अन्य आवश्यक दस्तावेज तैयार कर सरकारी मुआवजे की राशि स्वीकृत कराई गई। इस तरह करोड़ों रुपये के सरकारी धन का दुरुपयोग किए जाने की आशंका जताई जा रही है।
14 अलग-अलग एफआईआर हुई दर्ज
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब तक 14 अलग-अलग एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। पुलिस हर मामले की अलग-अलग जांच कर रही है ताकि पूरे फर्जीवाड़े में शामिल लोगों की भूमिका स्पष्ट हो सके। जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर कई अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई है और आगे भी गिरफ्तारियों की संभावना जताई जा रही है।
एसएसपी स्वयं कर रहे पूरे मामले की निगरानी
बिलासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) रजनेश सिंह स्वयं इस पूरे मामले की निगरानी कर रहे हैं। उनके निर्देशन में गठित टीम दस्तावेजों की जांच, बयान और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी है। पुलिस का कहना है कि फर्जी रिपोर्ट तैयार करने, दस्तावेजों का सत्यापन करने और मुआवजा स्वीकृत कराने की प्रक्रिया में जिसकी भी संलिप्तता सामने आएगी, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सरकंडा थाना क्षेत्र में दर्ज इस बहुचर्चित मामले की जांच अभी जारी है। पुलिस का दावा है कि जांच पूरी होने पर इस घोटाले से जुड़े कई और महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते हैं तथा सरकारी धन के दुरुपयोग में शामिल अन्य लोगों पर भी शिकंजा कसना तय है।
जिले में सर्पदंश से 431 मौतों का रिकॉर्ड
जानकारी के अनुसार, जशपुर जिले में पिछले तीन वर्षों के दौरान सर्पदंश से केवल 96 मौतें दर्ज की गईं, जबकि अकेले बिलासपुर जिले में 431 मौतों का रिकॉर्ड तैयार कर उनके आधार पर करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपये का सरकारी मुआवजा वितरित किया गया। आंकड़ों में इस असामान्य अंतर को लेकर विधानसभा में भी जोरदार हंगामा हुआ था। इसके बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने सदन में मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया था।
राज्य शासन के नियमों के अनुसार, सर्पदंश से मृत्यु होने पर मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपये की अनुग्रह सहायता (मुआवजा) दी जाती है। जांच एजेंसियों के अनुसार, इसी प्रावधान का कथित तौर पर दुरुपयोग करते हुए सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत बताकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और मुआवजे के लिए आवेदन प्रस्तुत किए गए। आरोप है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पंचनामा और अन्य अभिलेखों में हेरफेर कर सरकारी राशि स्वीकृत कराई गई।
मृतकों के परिजनों को मुआवजा राशि की नहीं हैं कोई जानकारी
जांच में सामने आया है कि कुछ मामलों में मृतकों के वास्तविक परिजनों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा राशि निकालकर उसे आपस में बांट लिया गया। पुलिस अब ऐसे सभी मामलों की अलग-अलग जांच कर रही है और दस्तावेज तैयार करने से लेकर मुआवजा स्वीकृत कराने और राशि निकालने तक की पूरी प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका की जांच कर रही है।
राजस्व विभाग के तीन कर्मचारी भी गिरफ्तार
एक दिन पहले तोरवा थाना पुलिस ने सिम्स में पदस्थ रहीं तत्कालीन डॉक्टर प्रियंका सोनी को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। पुलिस के अनुसार, डॉक्टर प्रियंका सोनी पर कई मामलों में सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत दर्शाते हुए कथित तौर पर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने का आरोप है। इन रिपोर्टों के आधार पर सरकारी मुआवजा स्वीकृत कराया गया । रविवार को अवकाश के दिन सरकंडा थाना पुलिस ने राजस्व विभाग के तीन कर्मचारियों को भी गिरफ्तार किया। गिरफ्तार आरोपियों में एसडीएम कार्यालय के लिपिक नरेंद्र कौशिक और गरीब राम बिंझवार तथा तहसीलदार कार्यालय के लिपिक हरिशंकर राठौर शामिल हैं।
पुलिस जांच में सामने आया है कि इन कर्मचारियों ने कथित तौर पर फर्जी प्रकरण दर्ज कर अपने अधिकृत लॉगिन (आईडी) से संबंधित रिपोर्ट और दस्तावेज तैयार किए, जिनके आधार पर शासन से सर्पदंश मृत्यु का मुआवजा स्वीकृत कराया गया। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे फर्जीवाड़े में और कौन-कौन अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल थे।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के दौरान सर्पदंश से मौत के मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने वाले करीब एक दर्जन डॉक्टरों से भी पूछताछ की जा रही है। उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्टों और संबंधित दस्तावेजों का मिलान किया जा रहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ और किसकी क्या भूमिका रही।
तहसीलदार का ड्राइवर गिरोह का मुख्य सरगना
इस मामले में पुलिस अब तक तहसील कार्यालय से निगम में अटैच ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा, अधिवक्ता खांडेकर, बिल्हा निवासी रंजीत चतुर्वेदी समेत दर्जनभर आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है। पुलिस जांच में गोविंद विश्वकर्मा को इस पूरे फर्जी मुआवजा गिरोह का मुख्य सरगना माना जा रहा है। आरोप है कि उसने राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार कराने और मुआवजा स्वीकृत कराने में अहम भूमिका निभाई। जांच के दौरान सिम्स और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों के कुछ डॉक्टरों के नाम भी सामने आए हैं, जिनसे पूछताछ जारी है।
गिरोह का मास्टरमाइंड वकील फरार, सिम्स के डॉक्टर भी रडार पर
पुलिस के अनुसार, इस घोटाले के पीछे एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय था। मामले में मृतकों के परिजनों समेत कई आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। वहीं, गिरोह का कथित मास्टरमाइंड वकील श्रवण वस्त्रकार अब भी फरार है, जिसकी तलाश जारी है। जांच में 15 संदिग्ध मामले सामने आए हैं और सिम्स के कुछ डॉक्टर भी पुलिस की रडार पर हैं। इस मामले की परतें लगातार खुल रही हैं। दो दिन पहले ही 16 जुलाई को सरकंडा पुलिस फर्जी स्नेक बाइट के 5 मामलों में बड़ी कार्रवाई करते हुए वकील हीराप्रसाद खांडेकर, बैंककर्मी कुशकुमार गुप्ता, कथित वकील महेन्द्र कुमार और तहसीलदार के दैनिक वेतनभोगी चालक गोविंद विश्वकर्मा को गिरफ्तार कर चुकी है।
