डोंगरगढ़ की देवी के नाम पर फिर छिड़ी बहस: बमलाई, बम्लेश्वरी या बगलामुखी? गोंड समाज की आपत्ति के बाद इतिहास पर उठे सवाल

डोंगरगढ़ की देवी के नाम पर फिर छिड़ी बहस: बमलाई, बम्लेश्वरी या बगलामुखी? गोंड समाज की आपत्ति के बाद इतिहास पर उठे सवाल

डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी के नाम और ऐतिहासिक पहचान को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। देवी के नाम की उत्पत्ति को लेकर सामने आए अलग-अलग दावों ने धार्मिक मान्यताओं, लोकपरंपराओं और पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। गोंड समाज ने कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा से जुड़े एक कथित बयान पर आपत्ति जताते हुए राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा है और स्पष्टीकरण के साथ माफी की मांग की है।

‘दाई बमलाई’ से ‘बम्लेश्वरी’ तक की परंपरा का दावा
गोंड समाज का कहना है कि डोंगरगढ़ की देवी को पुरानी स्थानीय परंपराओं में ‘दाई बमलाई’ के नाम से जाना जाता रहा है। समाज के मुताबिक समय के साथ यही नाम बदलकर ‘बम्लेश्वरी’ के रूप में प्रचलित हुआ। इस दावे के समर्थन में समाज डॉ. मोतीरावण कंगाली की पुस्तक ‘डोंगरगढ़ की बमलाई दाई बमलेश्वरी’ सहित स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं का हवाला देता है। समाज का तर्क है कि देवी के नाम से जुड़ी परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह स्थानीय समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति और पहचान से भी जुड़ी हुई है। हालांकि, इन दावों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए मूल अभिलेखों और प्राथमिक स्रोतों का अध्ययन जरूरी माना जा रहा है।

ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में मिला ‘बगलामुखी’ का उल्लेख
इस विवाद का एक दूसरा पहलू पुराने ब्रिटिशकालीन दस्तावेजों से सामने आता है। इतिहासकार और पुरातत्व सर्वेक्षण से जुड़े अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट में 1864 के डोंगरगढ़ का उल्लेख मिलता है। रिपोर्ट में बगलामुखी देवी के सम्मान में रविवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार का जिक्र किया गया है। यह दस्तावेज इसलिए अहम है क्योंकि उपलब्ध पुराने लिखित रिकॉर्ड में उस समय देवी का उल्लेख ‘बगलामुखी’ नाम से मिलता है। हालांकि, सिर्फ इस उल्लेख के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि बगलामुखी, बमलाई और बम्लेश्वरी एक ही नाम के अलग-अलग रूप हैं। इन नामों के बीच ऐतिहासिक संबंध स्थापित करने के लिए और प्रमाणों की जरूरत होगी।

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आज मंदिर की पहचान ‘मां बम्लेश्वरी’ के नाम से
वर्तमान समय में डोंगरगढ़ का प्रमुख धार्मिक स्थल आधिकारिक तौर पर मां बम्लेश्वरी मंदिर के नाम से जाना जाता है। पहाड़ी पर स्थित मुख्य मंदिर को मां बम्लेश्वरी और नीचे स्थित मंदिर को छोटी बम्लेश्वरी के रूप में पहचान मिली हुई है। यही वजह है कि मौजूदा धार्मिक पहचान और पुराने ऐतिहासिक संदर्भों के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। एक ओर वर्तमान में ‘बम्लेश्वरी’ नाम सर्वाधिक प्रचलित है, वहीं दूसरी ओर पुराने रिकॉर्ड और स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग नामों का उल्लेख मिलता है।

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विवाद का असली सवाल क्या है?
मौजूदा विवाद को सिर्फ नामों की लड़ाई के तौर पर देखना आसान होगा, लेकिन इसके पीछे इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति से जुड़े कई सवाल हैं। क्या ‘बगलामुखी’, ‘बमलाई’ और ‘बम्लेश्वरी’ अलग-अलग कालखंडों में इसी देवी के लिए इस्तेमाल किए गए नाम हैं? या फिर इनके पीछे अलग धार्मिक और स्थानीय परंपराएं रही हैं? इन सवालों का अंतिम जवाब किसी एक मौखिक दावे या एक दस्तावेज से नहीं निकलेगा। इसके लिए पुराने राजस्व रिकॉर्ड, मंदिर से जुड़े अभिलेख, ब्रिटिशकालीन दस्तावेज, पुरातात्विक साक्ष्य और स्थानीय समाज की मौखिक परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन करना होगा।

इतिहास और आस्था के बीच खड़ा है डोंगरगढ़ का सवाल
डोंगरगढ़ की देवी को लेकर मौजूदा बहस ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि किसी धार्मिक स्थल की पहचान तय करने में लोकपरंपरा, ऐतिहासिक दस्तावेज और वर्तमान धार्मिक मान्यता की भूमिका क्या होनी चाहिए ? उपलब्ध सामग्री में अलग-अलग नामों के संदर्भ जरूर मिलते हैं, लेकिन इनके बीच सीधा और निर्विवाद संबंध स्थापित करने वाला प्रमाण स्पष्ट नहीं है। ऐसे में डोंगरगढ़ की देवी के नाम को लेकर चल रही बहस का निष्कर्ष निकालने से पहले ऐतिहासिक स्रोतों की गहराई से जांच जरूरी होगी। फिलहाल, विवाद जारी है और गोंड समाज की आपत्ति के बाद इस मुद्दे पर आगे की प्रतिक्रिया का इंतजार है।

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