बिलासपुर का 'किलर' सिस्टम: पथरी के ऑपरेशन में आरक्षक की मौत, मेडिकल लॉबी का पोस्टमार्टम रिपोर्ट बदलने का भारी दबाव; विधायक बोले- विधानसभा में उठाऊंगा मामला
बिलासपुर। शहर में एक मामूली पथरी का ऑपरेशन सरकंडा थाने में पदस्थ 36 वर्षीय आरक्षक सत्यकुमार पाटले की मौत का फरमान बन गया। निजी अस्पताल की इस घोर लापरवाही ने पूरे शहर के मेडिकल सिस्टम और उसकी संवेदनहीनता की पोल खोल दी है। मामला अब तूल पकड़ चुका है। मस्तूरी विधायक ने इस घटना को सीधे तौर पर 'अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही' करार देते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, जिसके बाद शहर का स्वास्थ्य महकमा बैकफुट पर है।
विधानसभा में गूंजेगा आरक्षक की मौत का मामला

मस्तूरी विधायक ने इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि यह कोई सामान्य मौत नहीं है, बल्कि निजी अस्पताल की घोर लापरवाही और मुनाफाखोरी का नतीजा है। विधायक ने चेतावनी दी है कि इस मामले को रफा-दफा नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए ऐलान किया है कि वे इस मेडिकल नेगलिजेंस के मुद्दे को आगामी विधानसभा सत्र में जोर-शोर से उठाएंगे, ताकि रसूखदार अस्पताल संचालकों पर नकेल कसी जा सके।
पोस्टमार्टम में 'खेल' करने उतरी मेडिकल लॉबी, सिम्स पर भारी दबाव
आरक्षक की मौत के बाद सबसे बड़ा और गंदा खेल पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर खेला जा रहा है। शनिवार दोपहर जब आरक्षक का पार्थिव शरीर जिला अस्पताल लाया गया, तो परिजनों ने वहां की व्यवस्थाओं पर अविश्वास जताते हुए पोस्टमार्टम कराने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद शव सिम्स (CIMS) लाया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सिम्स अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने 4 डॉक्टरों की एक विशेष टीम (जिसमें डॉ. राहुल अग्रवाल, एक पैथोलॉजिस्ट, एक मेडिसिन और एक सर्जरी विशेषज्ञ शामिल हैं) का गठन किया और पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी कराई गई।
लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे जारी है। परिजनों ने मांग की थी कि निष्पक्षता के लिए उनके समाज के एक डॉक्टर को पीएम टीम में शामिल किया जाए, जिसे अस्पताल प्रबंधन ने नियम-कानून का डंडा दिखाकर सिरे से खारिज कर दिया। सूत्रों की मानें तो शहर की ताकतवर 'मेडिकल लॉबी' पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। सिम्स के एक बड़े डॉक्टर पर भारी दबाव बनाया जा रहा है ताकि रिपोर्ट को संबंधित निजी अस्पताल (लाइफ केयर/श्रीराम केयर) के पक्ष में तैयार किया जा सके। पूरी कोशिश है कि इस मेडिकल मर्डर को फाइलों में स्वाभाविक मौत या हार्ट अटैक साबित कर दिया जाए। यही वजह है कि परिजनों को इस जांच पर बिल्कुल भरोसा नहीं है और वे लगातार उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
40 हजार का पैकेज और तड़पकर चली गई जान
ग्राम एरमशाही (मस्तूरी) निवासी सत्या को 26 अप्रैल को पेट दर्द के बाद नेहरू नगर स्थित श्रीराम केयर अस्पताल लाया गया था। अस्पताल प्रबंधन ने 40 हजार रुपये के पैकेज में पथरी के ऑपरेशन का सौदा तय किया। 28 को भर्ती कर 29 को सर्जरी की गई। डॉक्टरों ने बड़े गर्व से बताया कि ऑपरेशन सफल है। लेकिन अगले ही दिन जब मरीज को खांसी उठी, तो 4-5 घंटे तक किसी स्टाफ या डॉक्टर ने उसकी सुध नहीं ली। तड़पते मरीज की हालत जब बिगड़ने लगी, तब अचानक 'किडनी में इंफेक्शन' की नई कहानी गढ़ी गई। डायलिसिस का झांसा दिया गया और अंततः अपनी खाल बचाने के लिए मरीज को वेंटिलेटर पर डालकर 'हार्ट अटैक' से मौत का फरमान सुना दिया गया।
एफआईआर पर अड़े परिजन, क्या पुलिस महकमा अपने ही जवान को दिला पाएगा न्याय?
इतने बड़े और आधुनिक सुविधाओं का दावा करने वाले अस्पताल में महज पथरी के ऑपरेशन से जवान की मौत ने सबको झकझोर दिया है। आक्रोशित परिजनों के हंगामे के बाद सिविल लाइन टीआई एसआर साहू, एएसपी पंकज पटेल और एएसपी मधुलिका सिंह दल-बल के साथ अस्पताल पहुंचे। परिजन सीधे तौर पर अस्पताल प्रबंधन और दोषी डॉक्टरों पर हत्या की FIR दर्ज करने की मांग पर अड़े हैं और आंदोलन की चेतावनी दी है। पुलिस का वही रटा-रटाया जवाब है कि पीएम रिपोर्ट के बाद कार्रवाई होगी। लेकिन जब रसूखदार मेडिकल लॉबी उसी पीएम रिपोर्ट को मैनेज करने में अपनी पूरी ताकत झोंक चुकी हो, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पुलिस प्रशासन अपने ही एक मृत आरक्षक को न्याय दिला पाता है ।
