200 रुपये की कुर्सी 2000 में खरीदी दुर्ग शिक्षा विभाग में जेम पोर्टल के नाम पर 3 लाख फर्जीवाड़ा

200 रुपये की कुर्सी 2000 में खरीदी दुर्ग शिक्षा विभाग में जेम पोर्टल के नाम पर 3 लाख फर्जीवाड़ा

रायपुर। दुर्ग जिले के शिक्षा विभाग में सरकारी पैसे के इस्तेमाल को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। सरकारी सिस्टम में बचत और पारदर्शिता के नाम पर कैसे खेल होता है इसका यह ताजा उदाहरण है। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने एक ऐसा टेंडर पास किया है जिसने पूरी सरकारी खरीदी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय बाजार में जो साधारण प्लास्टिक कुर्सी मात्र 200 से 500 रुपये के बीच आसानी से मिल जाती है उसे शिक्षा विभाग ने 2000 रुपये प्रति नग के हिसाब से खरीदा है। कुल 160 कुर्सियों के लिए 3 लाख 20 हजार रुपये का अनुबंध किया गया है।

बिना ब्रांड की कुर्सियों पर लुटाया सरकारी खजाना

यह पूरी खरीदी 30 दिसंबर 2024 को जेम पोर्टल के माध्यम से की गई है। सरकारी दस्तावेजों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि खरीदी गई इन कुर्सियों का कोई ब्रांड ही नहीं है। दस्तावेजों में साफ तौर पर इसे अनब्रांडेड रिवॉल्विंग काउंटर चेयर बताया गया है। इन कुर्सियों में प्लास्टिक मोल्डेड सीट हाइड्रोलिक एडजस्टमेंट और एबीएस बेस जैसी बेहद सामान्य खूबियां लिखी गई हैं। ऐसी खूबियों वाली कुर्सियां दुर्ग और बालोद के किसी भी स्थानीय फर्नीचर बाजार या ऑनलाइन ई कॉमर्स साइट पर काफी सस्ते दाम पर मिल जाती हैं। बिना किसी नामी कंपनी के प्रोडक्ट पर इतना ज्यादा पैसा खर्च करना सीधे तौर पर संदेह पैदा करता है।

बाजार भाव की अनदेखी और जेम पोर्टल पर सवाल

इस मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप की स्थिति है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब बाजार में समान श्रेणी की कुर्सियां बेहद कम कीमत पर उपलब्ध हैं तो सरकारी खजाने से इतनी बड़ी रकम क्यों लुटाई जा रही है। सरकारी खरीदी का एक सीधा प्रशासनिक नियम है कि किसी भी सामान को खरीदने से पहले बाजार मूल्य का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए। लेकिन इस खरीदी को देखकर साफ लगता है कि जिम्मेदार अफसरों ने बाजार भाव की पूरी तरह से अनदेखी की है।

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केंद्र और राज्य सरकार जेम पोर्टल का इस्तेमाल इसलिए करवाती हैं ताकि सरकारी खरीदी में बिचौलियों का खेल खत्म हो और सरकार को सस्ता सामान मिले। लेकिन यहां जेम पोर्टल के नाम पर ही महंगा सौदा कर लिया गया। क्या पोर्टल पर इससे सस्ते और अच्छे विकल्प मौजूद नहीं थे यह एक बड़ा जांच का विषय है।

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 उपयोगिता पर भी उठ रहे गंभीर सवाल

इसके अलावा विभाग ने अब तक यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि इतनी बड़ी संख्या में 160 कुर्सियां किस कार्यालय या संस्थान के लिए खरीदी गई हैं। क्या वाक़ई इतनी कुर्सियों की तत्काल आवश्यकता थी यह भी जांच के दायरे में आता है। प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस पूरे अनुबंध की गंभीरता से जांच होनी चाहिए।

जिला प्रशासन के आला अधिकारियों को इस खरीदी की फाइल रोककर बाजार दर से इसका मिलान करवाना चाहिए। इससे यह साफ हो सकेगा कि यह खरीदी नियमों के तहत हुई है या इसके पीछे कोई बड़ा कमीशन का खेल चल रहा है। अगर मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो विभाग में चल रहे कई और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल यह मामला पूरे प्रशासनिक हलके में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और लोग कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।

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