फोन टैपिंग पर घिर सकती है जांच एजेंसी? हाईकोर्ट में उठा बड़ा कानूनी सवाल, CBI से मांगा जवाब

 फोन टैपिंग पर घिर सकती है जांच एजेंसी? हाईकोर्ट में उठा बड़ा कानूनी सवाल, CBI से मांगा जवाब

बिलासपुर। फोन टैपिंग और उससे जुटाए गए साक्ष्यों की वैधता को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस छिड़ गई है। 'रविशंकर महाराज बनाम CBI' मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फोन इंटरसेप्शन प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवालों पर दोनों पक्षों से शपथ पत्र के साथ जवाब तलब किया है।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि फोन टैपिंग के लिए जारी आदेश की वैधानिक समीक्षा समय सीमा के भीतर नहीं हुई तो उसके आधार पर जुटाए गए साक्ष्यों की कानूनी वैधता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

क्या नियमों का पालन नहीं हुआ?
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से दलील दी गई कि दूरसंचार नियम, 2024 के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किसी भी फोन इंटरसेप्शन आदेश को निर्धारित समय सीमा के भीतर रिव्यू कमेटी के समक्ष रखा जाना आवश्यक है। दावा किया गया कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आदेश स्वतः अप्रभावी माना जा सकता है। याचिका में उठाए गए इस मुद्दे ने जांच प्रक्रिया को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि प्रक्रिया में किसी स्तर पर नियमों का पालन नहीं हुआ हो तो क्या उस आधार पर एकत्र किए गए साक्ष्य अदालत में टिक पाएंगे?

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कोर्ट ने मांगा स्पष्ट शपथ पत्र
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य याचिका में फोन इंटरसेप्शन आदेश को सीधे तौर पर चुनौती नहीं दी गई थी। बाद में दाखिल आवेदन के जरिए अतिरिक्त आधार जोड़े गए थे। इस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपनी सभी दलीलों को स्पष्ट रूप से दर्ज करते हुए नया शपथ पत्र दाखिल करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि मौखिक बहस में उठाए गए सभी कानूनी बिंदुओं को लिखित रूप में रिकॉर्ड पर लाया जाए, ताकि मामले की विस्तृत सुनवाई की जा सके।

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CBI से भी मांगा गया जवाब
मामले में CBI की ओर से कोर्ट को बताया गया कि इसी FIR से जुड़े अन्य मामलों पर भी हाईकोर्ट में सुनवाई लंबित है। इसके बाद कोर्ट ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वह संबंधित सक्षम प्राधिकारी और केंद्र सरकार से आवश्यक निर्देश प्राप्त कर 24 जून तक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे।

जांच एजेंसियों की प्रक्रिया पर फिर बहस
इस मामले ने एक बार फिर जांच एजेंसियों द्वारा अपनाई जाने वाली तकनीकी और कानूनी प्रक्रियाओं पर चर्चा तेज कर दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत के सामने नियमों के पालन से जुड़ी कोई कमी साबित होती है तो इसका असर केवल इस मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में फोन इंटरसेप्शन से जुड़े मामलों की जांच और साक्ष्यों की स्वीकार्यता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि मामले में अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है और कोर्ट ने किसी भी पक्ष के दावों पर अभी कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। फिलहाल, सभी निगाहें 24 जून की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जब CBI और याचिकाकर्ता दोनों के विस्तृत जवाब अदालत के सामने होंगे।

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