बिलासपुर: नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल पर 'सीबीएसई' के नाम पर धोखाधड़ी का आरोप, लाखों की फीस लेकर थमा रहे सीजी बोर्ड का पेपर

बिलासपुर: नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल पर 'सीबीएसई' के नाम पर धोखाधड़ी का आरोप, लाखों की फीस लेकर थमा रहे सीजी बोर्ड का पेपर

बिलासपुर। शहर के नेहरू नगर स्थित नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल में शिक्षा के नाम पर बड़े खेल का मामला सामने आया है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने सीबीएसई (CBSE) पैटर्न का झांसा देकर बच्चों का एडमिशन लिया, साल भर लाखों रुपये फीस वसूली, लेकिन अब परीक्षा के वक्त छात्रों को छत्तीसगढ़ बोर्ड (CGBSE) का पेपर दिलाने की तैयारी की जा रही है।

इस खुलासे के बाद अभिभावकों में भारी आक्रोश है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने स्कूल प्रबंधन को कड़ी फटकार लगाई है और सभी जरूरी दस्तावेज तलब किए हैं।

साल भर सीबीएसई की पढ़ाई, अब बोर्ड बदलने का दबाव

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अभिभावकों का कहना है कि सत्र की शुरुआत में स्कूल ने खुद को सीबीएसई स्कूल बताकर प्रचार किया था। इसी भरोसे पर सैकड़ों लोगों ने अपने बच्चों का दाखिला कराया और 1 लाख रुपये से ज्यादा की फीस भरी। पूरे साल बच्चों को एनसीईआरटी (NCERT) की महंगी किताबें पढ़ाई गईं। अब जब 5वीं और 8वीं की बोर्ड परीक्षाओं का समय आया, तो स्कूल प्रबंधन छात्रों को छत्तीसगढ़ बोर्ड (SCERT) के तहत परीक्षा दिलाने की तैयारी कर रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि यह सीधे तौर पर उनके और बच्चों के भविष्य के साथ धोखा है।

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मुफ्त किताबों के बदले महंगी बुक्स का 'खेल'

जांच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। नियमों के मुताबिक, राज्य शासन की ओर से निजी स्कूलों को भी छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की किताबें मुफ्त दी जाती हैं। शिक्षा विभाग का कहना है कि नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल ने इन किताबों का उठाव ही नहीं किया। इसके बजाय अभिभावकों पर निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें खरीदने का दबाव बनाया गया। चर्चा है कि किताबों के कमीशन के चक्कर में यह पूरा खेल रचा गया।

"बिना मान्यता के सीबीएसई के नाम पर एडमिशन लेना नियमों के खिलाफ है। अगर साल भर एनसीईआरटी पढ़ाकर अब अचानक बोर्ड बदला जा रहा है, तो यह छात्रों के साथ अन्याय है। हमने स्कूल प्रबंधन को तलब किया है, जांच के बाद कठोर कार्रवाई की जाएगी।"

 विजय टांडे जिला शिक्षा अधिकारी 

प्राचार्य की सफाई: "फीस का बोर्ड से लेना-देना नहीं"

मामले पर स्कूल के प्राचार्य प्रभात झा का तर्क अलग है। उन्होंने फीस के सवाल पर स्पष्ट जवाब न देते हुए कहा कि फीस स्कूल की सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है, न कि बोर्ड पर। उनका दावा है कि एनसीईआरटी और छत्तीसगढ़ बोर्ड के सिलेबस में ज्यादा अंतर नहीं होता, इसलिए छात्र आसानी से परीक्षा दे सकते हैं। हालांकि, उन्होंने इस पर चुप्पी साध ली कि जब मान्यता नहीं थी तो सीबीएसई का प्रचार क्यों किया गया।

रसूख के साये में 'शिक्षा का व्यापार'

हैरानी की बात यह है कि यह स्कूल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री अरुण साव के निवास के पास ही स्थित है। इसके बावजूद प्रशासन की नाक के नीचे इतना बड़ा खेल चलता रहा। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से यह सब हो रहा था?

अभिभावकों ने मांग की है कि स्कूल के खिलाफ केवल कागजी कार्रवाई न हो, बल्कि भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने जैसे कदम उठाए जाएं ताकि भविष्य में कोई दूसरा स्कूल बच्चों के करियर से खिलवाड़ न कर सके।

 

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