बिलासपुर की सियासत में बंद कमरे की मुलाकात से हलचल: कोयला कारोबारी के घर केंद्रीय कोयला मंत्री का डेरा, क्या पुराने क्षत्रपों के हाथ से खिसक रही कमान?

बिलासपुर की सियासत में बंद कमरे की मुलाकात से हलचल: कोयला कारोबारी के घर केंद्रीय कोयला मंत्री का डेरा, क्या पुराने क्षत्रपों के हाथ से खिसक रही कमान?

बिलासपुर। राजनीति में कभी-कभी अनौपचारिक मुलाकातें बड़े-बड़े औपचारिक आयोजनों से ज्यादा शोर करती हैं। मंगलवार को बिलासपुर के सियासी गलियारों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे अपने एक दिवसीय प्रवास पर न्यायधानी पहुंचे, लेकिन राजनीतिक पंडितों की नजरें उनके सरकारी कार्यक्रमों से ज्यादा एक निजी मुलाकात पर टिक गईं। मंत्री महोदय शहर के रामा वर्ल्ड स्थित कारोबारी प्रवीण झा के आवास पर पहुंचे, जहां कुछ भाजयुमो नेताओ की मौजूदगी में लंबी चर्चा हुई।

बाहर से देखने में यह भले ही एक सौहार्दपूर्ण और जनभागीदारी व क्षेत्रीय विकास पर हुई सामान्य चर्चा लगे, लेकिन पॉवर कॉरीडोर में इसके गहरे सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि क्या बिलासपुर की कमान अब पुराने और स्थापित नेताओं के हाथों से किनारे हो रही है?

एक दौर था जब दिल्ली या राज्य के बड़े मंत्री शहर में आते थे, तो उनका दरबार शहर के कद्दावर और दिग्गज नेताओं के इर्द-गिर्द सजता था। लेकिन अब नजारा बदल रहा है। किसी केंद्रीय मंत्री का सीधे एक कोल कारोबारी के घर जाकर राजनीतिक और समसामयिक विषयों पर विमर्श करना यह साफ संकेत है कि हाईकमान अब पारंपरिक चेहरों से अलग, नए और असरदार चेहरों के साथ एक समानांतर लाइन खींच रहा है।

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इस मुलाकात के तार क्षेत्र के हालिया राजनीतिक परिदृश्य से भी जोड़कर देखे जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि क्या मंत्रिमंडल में इस क्षेत्र के कुछ दिग्गज नेताओं को जगह न मिलना और अब केंद्रीय मंत्रियों का सीधे नए पॉवर सेंटर्स से संवाद स्थापित करना, आपस में कनेक्टेड है? यह इस बात का स्पष्ट इशारा हो सकता है कि पार्टी अब पुराने क्षत्रपों की बैसाखी के बजाय, युवाओं और समाज में आर्थिक व सामाजिक दखल रखने वाले नए चेहरों का एक नया इकोसिस्टम तैयार कर रही है।

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कोयला व्यापारी प्रवीण झा के घर हुई इस चाय-चर्चा में क्षेत्रीय विकास के आवरण में जो सियासी खिचड़ी पकी है, उसने स्थानीय दिग्गजों की नींद जरूर उड़ा दी है। इतना तो तय है कि बिलासपुर की राजनीति में अब सत्ता के केंद्र का विकेंद्रीकरण हो रहा है, और यह पुराने नेताओं के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।

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