सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो की मुश्किलें बढ़ीं: जाति प्रमाण पत्र मामले में हाईकोर्ट सख्त, 90 दिन में जांच का अल्टीमेटम, गरमाई सियासत

सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो की मुश्किलें बढ़ीं: जाति प्रमाण पत्र मामले में हाईकोर्ट सख्त, 90 दिन में जांच का अल्टीमेटम, गरमाई सियासत

छत्तीसगढ़ की सियासत में एक बार फिर 'जाति प्रमाण पत्र' का जिन्न बाहर आ गया है। सीतापुर विधानसभा सीट से विधायक रामकुमार टोप्पो के जाति प्रमाण पत्र की वैधता पर विवाद गहराता जा रहा है। पिछले दो वर्षों से फाइलों में दबी और सुस्त पड़ी जांच प्रक्रिया पर अब बिलासपुर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। अदालत के सीधे दखल और 90 दिन के अल्टीमेटम के बाद राज्य का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है।

जनजाति सुरक्षा मंच का हमला: "शुरुआत से ही संदिग्ध है प्रक्रिया

इस पूरे सियासी और कानूनी बवाल के केंद्र में **'जनजाति सुरक्षा मंच'** है, जिसने विधायक के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल रखा है। मंच के जिला संयोजक बिहारी लाल तिर्की ने हाल ही में एक प्रेस वार्ता कर विधायक रामकुमार टोप्पो पर गंभीर आरोप लगाए हैं। तिर्की का दावा है कि विधायक टोप्पो का जाति प्रमाण पत्र जारी करने की पूरी शासकीय प्रक्रिया शुरुआत से ही संदिग्ध और नियम-विरुद्ध रही है।

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क्या मुख्य आरोप और तकनीकी खामियां

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 दस्तावेजों का अभाव: तिर्की के अनुसार, यह विवादित जाति प्रमाण पत्र 19 सितंबर 2023 को लैलूंगा अनुविभागीय अधिकारी (SDO) कार्यालय से जारी किया गया था। आरोप है कि इस प्रमाण पत्र को बनाने की प्रक्रिया में कई बड़ी तकनीकी विसंगतियां (Technical Flaws) मौजूद हैं और आवश्यक दस्तावेजों की भारी कमी पाई गई है।

 शिकायत पर कार्रवाई नहीं: इन्हीं खामियों को आधार बनाते हुए मंच ने अक्टूबर 2023 में रायगढ़ की जिला स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष अपनी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन आरोप है कि सत्ता पक्ष के दबाव या प्रशासनिक लापरवाही के चलते इस पर कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई।

बिलासपुर हाईकोर्ट का सख्त रुख: 90 दिन का अल्टीमेटम

प्रशासनिक स्तर पर जब मामले में लीपापोती और सुस्ती नजर आई, तो शिकायतकर्ताओं ने न्याय के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सियासी संवेदनशीलता को देखते हुए इसे रिट याचिका के माध्यम से अदालत में चुनौती दी गई थी।

 प्रशासनिक सुस्ती पर फटकार: अदालत ने पूर्व में भी इस मामले में त्वरित जांच के स्पष्ट निर्देश दिए थे, लेकिन दो साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी कोई ठोस प्रगति रिपोर्ट सामने नहीं आई।

 2026 की नई याचिका और कड़ा आदेश: प्रशासन के इस ढुलमुल रवैये से नाराज होकर वर्ष 2026 में इस मामले में एक बार फिर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। 2 अप्रैल को हुई अहम सुनवाई में अदालत ने प्रशासन की भारी सुस्ती पर कड़ा संज्ञान लिया। कोर्ट ने कड़े शब्दों में जिला स्तरीय छानबीन समिति को निर्देशित किया है कि वह हर हाल में **90 दिनों के भीतर** जांच प्रक्रिया पूरी कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करे।

विधायक रामकुमार टोप्पो का पलटवार: "ठोस सबूत लाएं, साजिश न रचें

एक तरफ जहां हाईकोर्ट के आदेश से शिकायतकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं और विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है, वहीं सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो ने अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे अपनी राजनीतिक छवि खराब करने की एक सुनियोजित साजिश करार दिया है।

विधायक ने विरोधियों पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि 2023 के विधानसभा चुनाव के समय से ही विरोधी उनकी राजनीतिक सफलता और लोकप्रियता से घबराकर उनके खिलाफ लगातार षड्यंत्र रच रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में चुनौती देते हुए कहा:

यदि मेरा प्रमाण पत्र वाकई फर्जी है, तो शिकायतकर्ता मीडिया में निराधार आरोप लगाने और बयानबाजी करने के बजाय छानबीन समिति और अदालत के सामने अपने ठोस सबूत पेश करें। यह सिर्फ मेरी छवि को धूमिल करने का एक राजनीतिक प्रोपेगैंडा है

क्या हैं इस विवाद के सियासी मायने?

छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में, जहाँ आदिवासी अस्मिता और आरक्षण एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है, किसी मौजूदा विधायक के जाति प्रमाण पत्र का विवादों में घिरना एक बड़ा सियासी तूफान ला सकता है। सीतापुर एक हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीट रही है।

अगर हाईकोर्ट द्वारा तय की गई 90 दिनों की समय-सीमा के भीतर जिला स्तरीय छानबीन समिति की रिपोर्ट में विधायक रामकुमार टोप्पो के खिलाफ कोई भी प्रतिकूल तथ्य सामने आता है, तो न सिर्फ उनकी विधानसभा सदस्यता पर तलवार लटक सकती है, बल्कि इसका असर राज्य की राजनीति और आगामी चुनावों पर भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा।

फिलहाल, प्रदेश की पूरी सियासी जमात और मीडिया की निगाहें इस 90 दिन के अल्टीमेटम और जांच समिति की आगामी कार्रवाई पर टिक गई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि रामकुमार टोप्पो इस सियासी और कानूनी चक्रव्यूह से कैसे बाहर निकलते हैं।

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